21/07/2026
शबाना आज़मी: सिनेमा से समाज तक, एक बेखौफ आवाज़
मैं आप सभी को बताना चाहता हूँ कि मैं किसी राजनीतिक पार्टी का सदस्य नहीं हूँ और न ही किसी का पक्ष लेता हूँ, लेकिन एक कलाकार होने के नाते मैं अपनी सच्ची भावनाएँ बता रहा हूँ।
भारतीय सिनेमा में शबाना आज़मी का नाम केवल एक उत्कृष्ट अभिनेत्री के रूप में ही नहीं, बल्कि एक ऐसी नागरिक के रूप में भी लिया जाता है, जिन्होंने दशकों से सामाजिक और लोकतांत्रिक मुद्दों पर अपनी स्पष्ट राय रखी है। उन्होंने कई बार सत्ता की परवाह किए बिना अपनी बात कही और जनहित के सवालों पर खुलकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
हाल ही में शबाना आज़मी "संसद चलो" विरोध मार्च में शामिल हुईं। उन्होंने सोशल मीडिया पर यात्रा और प्रदर्शन के कई वीडियो साझा किए, जिनमें वे प्रदर्शनकारियों के साथ ट्रक में सफर करती और आगे बढ़ती दिखाई दीं। 75 वर्ष की आयु में भी उनका सक्रिय होना इस बात का संकेत है कि सार्वजनिक जीवन में उनकी प्रतिबद्धता आज भी उतनी ही मजबूत है।
शबाना आज़मी का सार्वजनिक जीवन केवल फिल्मों तक सीमित नहीं रहा। वे वर्षों से महिलाओं के अधिकार, शिक्षा, सांप्रदायिक सद्भाव, झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोगों के अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों जैसे मुद्दों पर मुखर रही हैं। उन्होंने कई जनआंदोलनों और नागरिक अभियानों में भाग लिया और समय-समय पर अपनी आवाज़ बुलंद की।
वे राज्यसभा की नामांकित सदस्य भी रह चुकी हैं और संसद में कला, संस्कृति तथा सामाजिक सरोकारों से जुड़े विषयों पर सक्रिय भागीदारी निभाई। उनका सार्वजनिक जीवन इस बात का उदाहरण है कि एक कलाकार समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी भी निभा सकता है।
मेरे लिए शबाना आज़मी केवल एक महान अभिनेत्री नहीं हैं, बल्कि उनसे जुड़ी एक याद मेरे जीवन की अमूल्य धरोहर है।
सन् 1986 में, जब मैं स्वर्गीय सत्यदेव दुबे जी के मार्गदर्शन में थिएटर का प्रशिक्षण ले रहा था, तब मुझे शबाना आज़मी जी के साथ एक स्ट्रीट प्ले (नुक्कड़ नाटक) में अभिनय करने का अवसर मिला। उस समय मैंने उनके व्यक्तित्व में अनुशासन, सादगी और सामाजिक सरोकारों के प्रति गहरी प्रतिबद्धता को बहुत करीब से महसूस किया।
एक युवा रंगकर्मी के लिए यह अनुभव किसी पाठशाला से कम नहीं था। आज, जब उन्हें फिर से सामाजिक और लोकतांत्रिक मुद्दों पर सक्रिय देखता हूँ, तो 1986 की वही यादें ताज़ा हो जाती हैं।
हर कलाकार की राजनीतिक राय से सभी लोग सहमत हों, यह आवश्यक नहीं है। लोकतंत्र की खूबसूरती भी यही है कि विचार अलग-अलग हो सकते हैं। लेकिन जब कोई कलाकार अपने विश्वास के अनुसार समाज के बीच खड़ा होता है और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखता है, तो वह नागरिक भागीदारी का एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है।
शबाना आज़मी का सफर हमें यह याद दिलाता है कि कला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज से संवाद करने और बदलाव की प्रेरणा देने का भी सशक्त माध्यम हो सकती है।
Blog by Abhishek Galshar
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