20/05/2026
भोजपुरी फ़िल्मों की शुरुआत फ़िल्म 'गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो' (1963) से हुई थी जिसे डायरेक्ट किया था डायरेक्टर कुंदन कुमार ने। यह फ़िल्म किस स्तर पे बनी थी इसका अंदाज़ा आप इसी से लगा सकते हैं कि इसका संगीत चित्रगुप्त ने दिया था और गीत लिखे थे शैलेंद्र ने। इतना ही नहीं फ़िल्म के गानों को आवाज़ दी थी उस दौर के दिग्गज सिंगर्स मोहम्मद रफ़ी और लता मंगेशकर ने। वैसे, इस फ़िल्म की इन सभी ख़ूबियों से कहीं दिलचस्प है इसके बनने की कहानी, जिसकी एक बड़ी वज़ह बने थे भारत के पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद (Dr. Rajendra Prasad) जी, जिनकी ख़ुद की मातृभाषा भोजपुरी ही थी।
यह वाक़या है साल 1950 में आयोजित एक अवाॅर्ड फंक्शन के दौरान का, जहाँ उस दौर के मशहूर कैरेक्टर एक्टर व राइटर नज़ीर हुसैन (Nazir Hussain) जी की मुलाक़ात राजेन्द्र प्रसाद जी से हुई थी। इस मुलाक़ात में राष्ट्रपति ने उनसे पूछा ’क्या आप पंजाबी हैं?' इस पर नज़ीर साहब ने बताया कि वे पंजाबी नहीं बल्कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर जिले के रहने वाले हैं। गाज़ीपुर का नाम सुनते ही राजेन्द्र प्रसाद जी ने उनसे भोजपुरी में बातें करनी शुरू कर दी और बातों-बातों में ही भोजपुरी भाषा में फ़िल्म बनाने की सलाह दे डाली। हालांकि नज़ीर हुसैन ने उस वक़्त तो फाइनेंस प्रॉब्लम बताते हुए बात को टाल दिया, लेकिन चूँकि गाज़ीपुर की बोली भी भोजपुरी से काफी हद तक मिलती-जुलती है इसलिए उनके मन में एक कोने में राजेन्द्र प्रसाद जी की बात बैठ गयी।
नज़ीर जी के दिल में भोजपुरी फ़िल्म बनाने का जज़्बा तब और बढ़ गया जब उन्होंने 'गंगा-जमुना' (1961) की शूटिंग करनी शुरू की। शूटिंग के दौरान नज़ीर साहब को यह ख़्याल बार-बार झकझोरता कि अगर हिंदी के साथ अवधी बोली इस्तेमाल कर एक कामयाब फ़िल्म बन सकती है तो भोजपुरी में क्यूँ नहीं? बस इसके बाद तो उन्होंने जल्द ही एक स्क्रिप्ट भी तैयार कर ली और पहुँच गये डायरेक्टर बिमल रॉय (Bimal Roy) जी के पास। बता दें कि नज़ीर जी राइटिंग के साथ-साथ डायरेक्टर बिमल राॅय के असिस्टेंट के रूप में भी काम करते रहते थे। उन्होंने ’गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो' की स्क्रिप्ट बिमल राॅय को सुनाई जो उन्हें पसंद भी आ गई, लेकिन उन्होंने नज़ीर से पूछा, "ये भोजपुरी कौन सी भाषा है?" इस पर नज़ीर ने जवाब दिया, "ये हमारे देश के राष्ट्रपति की भाषा है" और स्क्रिप्ट वापस ले ली।
दरअसल बिमल जी इस फ़िल्म को हिंदी में बनाने के लिये तैयार थे लेकिन भोजपुरी में नहीं, जबकि नज़ीर ठान चुके थे कि यह फ़िल्म बनेगी तो भोजपुरी में ही। इसके बाद नज़ीर जी ने इस फ़िल्म के डायरेक्शन के लिये कुंदन कुमार को राज़ी कर लिया, क्योंकि उनका बैकग्राउंड वाराणसी का था इसलिए वे उनकी स्क्रिप्ट के साथ पूरा न्याय कर सकते थे। उन्होंने तय किया कि फ़िल्म डेढ़ लाख (1.5 लाख) के बजट में पूरी कर लेनी है। काफी कोशिशों के बावजूद जब एक भी प्रोड्यूसर इस फ़िल्म में पैसे लगाने को तैयार नहीं हुआ तो नज़ीर हुसैन की मदद के लिये एक कोयला व्यासायी और सिनेमा हॉल के मालिक विश्वनाथ प्रसाद शाहाबादी आगे आये। उन्होंने कहानी सुनते ही नज़ीर को दस हजार रूपये एडवांस में दे दिये।
फ़िल्म का बजट तो डेढ़ लाख का था लेकिन इसके तैयार होते-होते क़रीब 5 लाख रुपये लग गए थे। ख़ैर, जब यह फ़िल्म बनकर रिलीज़ हुई तो ज़बरदस्त कामयाबी हासिल की, आलम ये था कि उस दौर में इस फिल्म ने 80 लाख की कमाई की थी। साल 1963 में ’गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ को सबसे पहले पटना और बनारस में रिलीज़ किया गया था। कहा जाता है कि फ़िल्म को देखने के लिए भीड़ इतनी होती थी कि पुलिस भी कंट्रोल नहीं कर पाती थी। इस फ़िल्म में एक्ट्रेस कुमकुम और बनारस के असीम कुमार के साथ ख़ुद नज़ीर ने भी काम किया था, साथ ही इसमें पद्मा खन्ना भी चाइल्ड एक्टर के रूप में नज़र आयीं थीं जो आगे चलकर भोजपुरी की सबसे बड़ी एक्ट्रेस बनीं, साथ ही हिंदी फ़िल्मों में भी अपनी पहचान बनायी।
फ़िल्म की इस कामयाबी को भुनाने के लिये आगे कई सारी भोजपुरी फ़िल्मों के टाइटल में गंगा नाम का इस्तेमाल किया गया जो आज तक ज़ारी है। नज़ीर हुसैन ने इसके बाद ख़ुद की लिखी भोजपुरी फिल्म 'हमार संसार' (1965) का निर्माण किया और फिर साल 1979 में अपनी एक और भोजपुरी फ़िल्म 'बलम परदेसिया' का निर्देशन भी किया। अपनी धुन के पक्के हरफ़नमौला दिग्गज कलाकार 'नज़ीर हुसैन' जी को बॉलीवुड यात्रा नमन करता है।
Copyright Bollywood Yaatra 🎬🎼