Qissa TV

Qissa TV Kissa TV is a YouTube channel which is popular for Biographies and other informative videos.
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At Kissa TV, You will find the information about forgotten and less popular actors. किस्सा टीवी एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जो मुख्यतौर पर सिनेमा व सिने कलाकारों के बारे में बात करता है। खासतौर पर गुज़रे ज़माने की फिल्में व कलाकारों को किस्सा टीवी याद करता है। हालांकि इतिहास, खेल और देश व दुनिया की रोचक जानकारियां भी किस्सा टीवी समय-समय पर साझा करता रहता है।

बीबीसी वाले दो दफा इन्हें लंदन ले जाने की कोशिश कर चुके थे। लेकिन हर दफा नाकाम रहे। लेकिन बीबीसी वाले इन्हें लंदन क्यों ...
20/05/2026

बीबीसी वाले दो दफा इन्हें लंदन ले जाने की कोशिश कर चुके थे। लेकिन हर दफा नाकाम रहे। लेकिन बीबीसी वाले इन्हें लंदन क्यों ले जाना चाहते थे? ये कहानी जानने से पहले हमें समय में थोड़ा और पीछे जाना होगा। इनका नाम है राज मेहरा। और आपने इन्हें कई पुरानी फिल्मों में देखा होगा। ये बहुत दिग्गज चरित्र अभिनेता थे।

20 मई 1913 को बनारस में राज मेहरा जी का जन्म हुआ था। इनकी शुरुआती शिक्षा बनारस में ही हुई। फिर हायर स्टडीज़ के लिए राज मेहरा दिल्ली आ गए। ईश्वर ने राज मेहरा जी को बड़ी शानदार आवाज़ देकर इस दुनिया में भेजा था। इसलिए पढ़ाई पूरी करने के बाद एक कंपनी के सेल्स विभाग में राज मेहरा जी की नौकरी लग गई।

अपनी आवाज़ के दम पर सेल्स की अपनी नौकरी में राज मेहरा जी ने काफी तरक्की की। आवाज़ और बोलने का इनका अंदाज़ मशहूर हुआ तो ऑल इंडिया रेडियो में इन्हें ड्रामा आर्टिस्ट की हैसियत से काम करने का मौका भी मिलने लगा। ऑल इंडिया रेडियो में भी इनकी आवाज़ का जादू कुछ ऐसा चला कि इन्हें न्यूज़ कमेंटेटर और ट्रांसलेटर की हैसियत से नौकरी भी मिल गई।

यूं इस तरह सेल्स की नौकरी को पूरी तरह से छोड़कर राज मेहरा रेडियो ब्रॉडकास्टिग इंडस्ट्री में आ गए। इसी दौरान इनकी शादी भी हो गई। और समय के साथ इन्हें तरक्की भी मिल गई। ये ऑल इंडिया रेडियो में असिस्टेंट प्रोग्राम डायरेक्टर बन गए। इस पोस्ट पर रहते हुए ही एक दिन इन्हें बॉम्बे जाने का मौका मिला। बॉम्बे स्टेशन में भी राज मेहरा ने कुछ महीनों तक काम किया था। अपनी आवाज़ के चलते राज मेहरा रेडियो की दुनिया में काफी मशहूर हो चुके थे।

राज मेहरा जी की कहानी पहले भी क़िस्सा टीवी पर कही जा चुकी है। आप अगर फिर से पढ़ना चाहें इनकी विस्तृत कहानी तो कमेंट सेक्शन में वो लेख मौजूद है जिसमें हमने इनकी कहानी लिखी है। पढ़िएगा उसे। इनके बारे में और भी कुछ रोचक बातें आपको जानने को मिलेंगी। आज जन्मदिवस के मौके पर क़िस्सा टीवी राज मेहरा जी को बहुत सम्मान से याद करते हुए उन्हें नमन करता है।

"जवानी में मैंने कई जगहों पर हरकतें की थी। उस वक्त मेरे से जितने शुक्राणू निकले, उनमें से एक से वो पैदा हुई थी।" जैमिनी ...
20/05/2026

"जवानी में मैंने कई जगहों पर हरकतें की थी। उस वक्त मेरे से जितने शुक्राणू निकले, उनमें से एक से वो पैदा हुई थी।" जैमिनी गणेशन ने पत्रकार ज्योति वेंकटेश के एक सवाल के जवाब में ये बात कही। ज्योति वेंकटेश ने जैमिनी गणेशन से सवाल पूछा था कि अपनी बेटी रेखा के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे?

जैमिनी गणेशन ने जवाब में वो बात कही जो आपने अभी शुरू में पढ़ी है। उनके उस जवाब ने ज्योति वेंकटेश को भी सकते में ला दिया। उन्होंने जैमिनी गणेशन से पूछा कि क्या इस बात को वो अपने आर्टिकल में लिख सकते हैं? जैमिनी गणेशन ने बिना संकोच किए कहा कि बिल्कुल लिख सकते हो। तुमने पूछा है और मैंने जवाब दिया है।

वो इंटरव्यू पूरा करने के बाद ज्योति वेंकटेश ने घर आकर अपना वो आर्टिकल ढंग से लिखा और उसे स्टारडस्ट मैगज़ीन में पब्लिश कराया। जैसे ही वो आर्टिकल पब्लिक हुआ, फ़िल्म इंडस्ट्री में हंगामा हो गया। सबको लग रहा था कि रेखा ज़रूर वो आर्टिकल लिखने वाले पत्रकार की क्लास लगा देंगे। मगर रेखा ने एक फोन भी ज्योति वेंकटेश ने नहीं किया।

शायद रेखा को अंदाज़ा था कि उनके पिता जैमिनी गणेशन ने ये बात बोली ही होगी। कोई पत्रकार अपनी तरफ़ से तो इतनी बड़ी बात नहीं लिख सकता। कुछ दिन पहले पत्रकार ज्योति वेंकटेश ने ही ये बातें एक पोडकास्ट में बताई हैं। ज्योति वेंकटेश एक सीनियर फ़िल्म जर्नलिस्ट हैं। सालों से फ़िल्म जर्नलिज़्म कर रहे हैं।

ज्योति वेंकटेश ने ये भी बताया था कि जैमिनी गणेशन का वो इंटरव्यू उन्होंने जब किया था उससे पहले ही वो रेखा का भी एक इंटरव्यू कर चुके थे। और रेखा को बड़ी मुश्किल से उस इंटरव्यू के लिए मनाया गया था। रेखा पत्रकारों से बात करने से कतराती थी।

मगर चूंकि प्रकाश मेहरा की ज्योति वेंकटेश से बढ़िया जान-पहचान थी। और रेखा तब प्रकाश मेहरा की किसी फ़िल्म में काम कर रही थी।(जो पता नहीं पूरी हो भी पाई या नहीं।) प्रकाश मेहरा के कहने पर ही रेखा तब ज्योति वेंकटेश को इंटरव्यू देने को राज़ी हुई थी। शुरुआत में तो रेखा झिझक रही थी ज्योति जी से बात करने में।

मगर जब इंटरव्यू शुरु हुआ तो ज्योति वेंकटेश ने रेखा से एक भी ऐसा सवाल नहीं पूछा जो रेखा को असहज करे। बल्कि ऐसे-ऐसे सवाल किए जिनके जवाब देने में रेखा को मज़ा आए। जैसे कि, आप इतने सालों से काम कर रही हैं। लेकिन आप अभी भी इतनी सुंदर हैं। जवान दिखती हैं। ज़रा भी नहीं बदला है आपका चेहरा। ये आपने कैसे मैंटेन किया है?

इस सवाल के जवाब में रेखा ने मुस्कुराते हुए कहा था कि ये तो सब भगवान का आशीर्वाद है। उन्होंने कोई सर्जरी नहीं कराई है, जैसा कि कुछ लोग दावा करते हैं।

"आप तो वो आशिकी वाली अनु अग्रवाल हैं ना?" ऑटो वाले ने बहुत उत्साहित और आश्चर्यचकित होते हुए अपनी गर्दन पीछे घुमाकर अनु अ...
20/05/2026

"आप तो वो आशिकी वाली अनु अग्रवाल हैं ना?" ऑटो वाले ने बहुत उत्साहित और आश्चर्यचकित होते हुए अपनी गर्दन पीछे घुमाकर अनु अग्रवाल से पूछा। अनु अग्रवाल थोड़ा झिझकी। थोड़ा शरमाई। फिर उन्होंने कहा कि हां, मैं ही आशिकी वाली अनु अग्रवाल हूं। वो ऑटो वाला बड़ा खुश हुआ।

लेकिन इस कहानी में अनु के साथ कुछ क़िस्से उस दिन उस ऑटो वाले के मिलने से पहले भी हुए थे। चलिए, वहीं से ये कहानी शुरू करते हैं। छोटी सी कहानी है। पसंद आएगी आपको। इसे लाइक-शेयर करके अनु अग्रवाल और आशिकी फ़िल्म के बारे में एक प्रतिक्रिया अवश्य दीजिएगा।

उस दिन जब अनु अग्रवाल ने अपने पीजी की खिड़की से बाहर झांककर देखा तो वो बहुत हैरान हुई। सड़क के दोनों तरफ़ युवा लड़के खड़े थे। और उन्होंने लाइन बना रखी थी। उन लड़कों ने पीजी की दीवारों पर दिल बनाकर उसके बीच में लिखा था "अनु आई लव यू।" ऐसा ही कुछ फ़िल्म में राहुल रॉय ने भी अनु के लिए किया था। जी हां, ये आशिकी फ़िल्म के रिलीज़ होने के बाद की बात है। अनु अग्रवाल रातों-रात स्टार बन गई थी।

वो नज़ारा अनु अग्रवाल के लिए बहुत गूज़बम्पिंग और अमेज़िंग तो था। मगर थोड़ा घबरा जाने वाला भी था। क्योंकि लड़कों की भीड़ बहुत ज़्यादा थी। और कभी भी वो भीड़ बेकाबू हो सकती थी। इसलिए अनु अग्रवाल पीछे के रास्ते पीजी से निकल गई। अनु ने फटाफट एक ऑटो रिक्शा को हाथ दिया।

ऑटो रिक्शा रुका तो फौरन वो उसमें बैठ गई। इत्तेफ़ाक ऐसा हुआ कि ऑटो रिक्शा वाले ने भी आशिकी फ़िल्म का गीत "दिल का आलम" चला रखा था। ऑटो वाले ने अनु के बताए पते की तरफ़ ऑटो बढ़ा दिया। मगर जैसे ही उसने नोटिस किया कि उसके रिक्शा में आशिकी गर्ल अनु अग्रवाल ही बैठी है तो उसने पीछे गर्दन घुमाई और बोला,"आप तो वो आशिकी वाली अनु अग्रवाल हैं ना?"

शरमाते हुए अनु अग्रवाल ने हामी भरी। फिर तो पूरे रास्ते वो ऑटो वाला कचर-कचर, पकर-पकर करते गया। मतलब आशिकी फ़िल्म की तारीफ़ें मारता गया। फ़िल्म ऐसी है। फ़िल्म वैसी है। ये गाना बहुत बढ़िया है। वो गाना शानदार है। कुल मिलाकर उस ऑटो वाले की बातों का सार ये था कि आशिकी फ़िल्म हर किसी के दिल में बस गई है।

अनु अग्रवाल की डेब्यू फ़िल्म थी आशिकी। और पहली फ़िल्म से ही अनु अग्रवाल स्टार बन गई थी। एनडीटीवी वालों ने अपने एक आर्टिकल में 30 लाख रुपए बजट बताया है आशिकी का। विकीपीडिया पर दिया गया फ़िगर ही चिपका दिया। लेकिन आशिकी का बजट 90 लाख से 1 करोड़ रुपए था। और कमाई थी। 3 करोड़ 25 लाख रुपए।

यानि आशिकी बड़ी हिट रही थी। मगर अनु अग्रवाल का वो स्टारडम मैंटेन ना रह सका। वो वन हिट वंडर बनकर ही रह गई। कुछ और फ़िल्मों में वो दिखी थी। उसके बाद फ़िल्म इंडस्ट्री से पूरी तरह गायब हो गई। अब सोशल मीडिया के दौर में ज़रूर अनु अग्रवाल चर्चाओं में आती रहती हैं कभी-कभार।

"लोग क्या कहेंगे मुझे मालूम नहीं। लेकिन मैं बोलता हूं हम अभी उनसे 50 साल पीछे हैं पिक्चर बनाने में। वो लोग पैसे की कीमत ...
20/05/2026

"लोग क्या कहेंगे मुझे मालूम नहीं। लेकिन मैं बोलता हूं हम अभी उनसे 50 साल पीछे हैं पिक्चर बनाने में। वो लोग पैसे की कीमत और समय की कीमत को जितना अच्छे से समझते हैं, उतना हमारे यहां के लोग नहीं समझते।"

ये बात कही थी नाना पलसीकर जी ने बहुत साल पहले, तबस्सुम गोविल जी को दिए एक इंटरव्यू में। उस वक्त नाना पलसीकर रिचर्ड एटनबरॉ की फ़िल्म गांधी में काम कर रहे थे। नाना पलसीकर जी ने ये भी कहा था कि सब्जेक्ट की रिचनेस के मामले में हम लोग किसी से पीछे नहीं हैं।

लेकिन काम करने के तरीके में हम लोग पीछे हैं। आजा भारतीय सिनेमा के "सिंबल ऑफ़ पॉवरटी" नाना पलसीकर साहब का जन्मदिवस है। साल 1907 की 20 मई को नाना पलसीकर जी का जन्म हुआ था।

नाना पलसीकर जी ने कभी शादी नहीं की थी। उनका कहना था कि फ़िल्म इंडस्ट्री में उन्हें बहुत लंबा संघर्ष करना पड़ा। इसलिए कभी शादी करने का ख्याल आया ही नहीं।

क्योंकि अगर शादी कर भी लेते तो अपनी औलाद को बहुत अच्छा जीवन ना दे पाते। उन्होंने अपने भाई-बहनों की शादी कराई, और उन्हीं के बच्चों को अपने बच्चों की तरह प्यार दिया।

पचास साल लंबे अपने करियर में नाना पलसीकर जी ने एक्टर्स की कई पीढ़ियों के साथ काम किया था। साइलेंट फ़िल्मों के ज़माने से शुरू हुआ नाना पलसीकर जी का करियर साल 1984 की फ़िल्म "कानून क्या करेगा" पर खत्म हुआ था।

उसी साल, यानि 1984 की 1 जून को नान पलसीकर जी का देहांत हो गया था। किस्सा टीवी नाना पलसीकर जी को बहुत सम्मान से याद करते हुए, नमन करता है।

ओम शिवपुरी जी को दुनिया से गए हुए तब तक 18 साल बीत चुके थे। सुधा शिवपुरी जी के बच्चे भी तब तक काफ़ी बड़े हो चुके थे। उनक...
20/05/2026

ओम शिवपुरी जी को दुनिया से गए हुए तब तक 18 साल बीत चुके थे। सुधा शिवपुरी जी के बच्चे भी तब तक काफ़ी बड़े हो चुके थे। उनके पास करने के लिए कुछ काम नहीं था।

सुधा जी ठहरी नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा से पास आउट ट्रेंड एक्ट्रेस। किसी वक्त पर खूब थिएटर कर चुकी थी। फ़िल्में भी कर चुकी थी। कुछ टीवी शोज़ में भी अभिनय कर चुकी थी।

इसलिए उन्होंने सोचा कि वो फिर से अभिनय करेंगी। सुधा जी की उम्र तब तक 60 साल हो चुकी थी। इसलिए जब उन्होंने फिर से एक्टिंग करने की अपनी ख्वाहिश अपने बच्चों को बताई तो बच्चों ने ऐतराज़ जताया।

बच्चे नहीं चाहते थे कि इस उम्र में भी सुधा जी कोई काम करें। मगर सुधा जी का मन था तो बच्चों को मानना ही पड़ा। बालाजी टेलिफ़िल्म्स के शो बंधन से सुधा शिवपुरी जी की दूसरी पारी शुरु हुई।

सुधा जी बहुत खुश थी। उनका मन लग रहा था। एक दिन एकता कपूर ने सुधा जी से पूछा कि क्या सुधा जी बालाजी टेलिफ़िल्म्स के नए शो "क्योंकि सास भी कभी बहू थी" में दादी का किरदार निभाना चाहेंगी?

सुधा जी तैयार हो गई। और बिना ऑडिशन लिए ही सुधा जी को उस शो में बा, यानि दादी के किरदार के लिए साइन कर लिया गया। सुधा जी कहती थी कि उन्हें वो किरदार निभाने में कोई मेहनत नहीं करनी पड़ी।

शो में बा का जैसा किरदार है, रियल लाइफ़ में भी वो ऐसी ही हैं। हां, बा के किरदार के लिए सुधा जी ने एक तैयारी ज़रूर की थी। वो मुंबई के एक ऐसे मंदिर जाने लगी थी जहां गुज़राती महिलाएं आती थी।

सुधा जी गुजराती महिलाओं के बात करने के तरीके और बिहेव को करीब से निहारती थी। बस इतनी ही तैयारी उन्होंने बा के रोल के लिए की थी। कुछ तजुर्बा उन्हें पूर्व में निभाए गए गुजराती किरदारों से भी मिला था।

जिन लोगों को एकता कपूर का वो शो "क्योंकि सास भी कभी बहू थी" याद होगा, वो ये भी जानते होंगे कि बा का किरदार कितना लोकप्रिय था। सुधा जी कहती थी कि उस रोल को साइन करते वक्त उन्हें ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि वो आगे चलकर इतना ज़्यादा पसंद किया जाएगा।

शुरुआत में तो उन्हें बस यही लगता था कि ये भी दादियों के दूसरे किरदारों जैसा होगा। लेकिन शो के लेखकों की टीम ने, और एकता कपूर ने उस किरदार को बहुत बढ़िया से प्रोजेक्ट किया।

"क्योंकि सास भी कभी बहू थी" शो ने सुधा शिवपुरी जी को बहुत ख्याति दिलाई थी। उतनी ख्याति तो सुधा जी को तब भी नहीं मिली थी जब वो फ़िल्मों में काम करती थी। सुधा जी कहती थी कि लोग जब उन्हें कहीं देखते थे तो बा कहकर पुकारते थे। सुधा जी को बहुत खुशी मिलती थी जब लोग उनसे प्यार और सम्मान जताते थे।

साथियों आज बा यानि सुधा शिवपुरी जी की पुण्यतिथि है। साल 2015 में आज ही के दिन, 20 मई को सुधा शिवपुरी जी का देहांत हुआ था। सुधा शिवपुरी जी के पति ओम शिवपुरी जी भी फ़िल्म इंडस्ट्री का जाना-पहचाना चेहरा हुआ करते थे किसी वक्त पर।

सुधा जी ने उनसे प्रेम विवाह किया था। और ये ओम शिवपुरी जी ही थे जो सुधा जी को नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा तक लेकर आए थे। और फिर फ़िल्मों में भी लाए।

सुधा जी ने बसू चटर्जी की फ़िल्म स्वामी(1977) में पहली दफ़ा अभिनय किया था। और आखिरी दफ़ा वो दिखी थी साल 2003 में आई पिंजर में। पिंजर के बाद सुधा जी ने किसी फ़िल्म में काम नहीं किया।

सुधा जी कहती थी कि फ़िल्मों में उनके लिए कुछ रहा नहीं था। लोग उन्हें ऐसे किरदार ऑफ़र करते थे जिनका एक भी डायलॉग नहीं होता था। इसलिए उन्होंने फ़िल्मों में काम करना बंद कर दिया था।

एक इंटरव्यू में सुधा शिवपुरी जी ने अपने बचपन के बारे में बात करते हुए बताया था कि वो आठवी क्लास में ही थी जब उनके पिता का देहांत हो गया था। पिता की मौत के बाद उनकी मां भी बीमार रहने लगी थी।

घर में आर्थिक मुसीबतें बहुत बढ़ गई। घर को सपोर्ट करने के लिए सुधा जी ने छोटी उम्र से ही नाटकों में काम करना शुरू कर दिया था। बाद में वो रेडियो नाटकों में भी काम करने लगी।

वहां सुधा जी को 150 रुपए महीना सैलरी मिलती थी। ये जयपुर की बात है। रेडियो नाटकों में काम करने के दौरान ही ओम शिवपुरी जी से उनकी मुलाकात हुई थी। दोनों की दोस्ती हो गई। और फिर दोनों एक-दूजे को पसंद करने लगे।

ये दोनों शादी भी करना चाहते थे। मगर सुधा जी की मां नहीं चाहती थी कि वो ओम जी से शादी करें। क्योंकि ओम जी के भविष्य का कुछ पता नहीं था तब। और सुधा जी की मां ने इनके लिए एक बढ़िया कमाने वाला लड़का ढूंढ रखा था।

जब ओम शिवपुरी जी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय यानि एनएसडी दिल्ली आ गए तो उन्हें पता चला कि सुधा जी की मां उनकी शादी कराने के मूड में हैं। ओम जी ने सुधा जी को सलाह दी कि किसी तरह तुम भी एनएसडी में दाखिला ले लो। तुम्हारी शादी टल जाएगी बाद में हम शादी कर लेंगे।

सुधा जी ने वैसा ही किया। और बड़ी मुश्किल से उन्होंने अपनी मां को मनाकर एनएसडी में दाखिला ले लिया। फिर साल 1968 में दोनों ने शादी कर ली। ओम जी व सुधा जी शादी के बाद नाटकों में काम करने लगे।

दोनों अपनी एक नाटक कंपनी भी शुरू की थी, जिसका नाम था दिशांतर। अपनी नाटक कंपनी में सुधा जी व ओम जी ने कुछ शानदार नाटक, जैसे आधे अधूरे, तुग़लक और खामोशी का मंचन किया। इन नाटकों को खूब सराहा भी गया था।

फिर कुछ साल बाद ओम शिवपुरी जी को फ़िल्मों में काम करने के ऑफ़र्स मिलने लगे। ओम जी व सुधा जी मुंबई आ गए। मुंबई आकर सुधा जी ने भी फ़िल्मों में काम किया।

लेकिन 12 फ़िल्मों में काम करने के बाद उन्होंने ब्रेक ले लिया। क्योंकि इस वक्त तक उनके बच्चे जन्म ले चुके थे। और वो अपना समय बच्चों के साथ बिताना चाहती थी। बाद में जब बच्चे कुछ बड़े हुए तो सुधा जी ने कुछ टीवी शोज़ में काम किया।

मधुर भंडारकर का बचपन बहुत गरीबी में गुज़रा था। वो छठी क्लास में फेल हो गए थे। और उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी थी। फिर वो एक वी...
19/05/2026

मधुर भंडारकर का बचपन बहुत गरीबी में गुज़रा था। वो छठी क्लास में फेल हो गए थे। और उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी थी। फिर वो एक वीडियो पार्लर में काम करने लगे। उनका काम था वीडियो कैसेट्स की डिलीवरी करना।

मधुर भंडारकर अपनी साइकिल पर वीडियो कैसेट्स डिलीवर करने जाते थे। और तब उनका एक्टर्स, बार गर्ल्स, अंडरवर्ल्ड के लोगों व बिजनेसमैन के यहां खूब जाना होता था। ये काम उन्होंने चार-पांच सालों तक किया था।

मधुर भंडारकर ने बताया था कि तभी से वो ह्यूमन बिहेवियर को समझना शुरू कर चुके थे। वो लोगों से बात करते थे। और उन्हें बहुत बारीकी से ऑब्ज़र्व करते थे।

मधुर उस दौरान जिन एक्टर्स को वीडियो कैसेट्स की डिलीवरी देते थे, उनमें मिथुन चक्रवर्ती इकलौते थे जिन्होंने फ़िल्मी दुनिया में आने के बाद मधुर को पहचाना था, कि ये तो वही लड़का है जो कभी वीडियो कैसेट्स की डिलीवरी देने आता था।

उस फेज़ में मधुर भंडारकर को फ़िल्मों का बहुत ज्ञान हो गया था। फिर एक वक्त आया जब मधुर भंडारकर राम गोपाल वर्मा के असिस्टेंट बन गए। राम गोपाल वर्मा के पास भी मधुर भंडारकर ने तीन-चार सालों तक काम किया था।

और रंगीला के रिलीज़ होने के बाद मधुर ने राम गोपाल वर्मा से खुद को अलग कर लिया। और अगले दो सालों तक मधुर भंडारकर इंडिपेंडेंट डायरेक्टर के तौर पर कोई फ़िल्म हासिल करने की कोशिश में लगे रहे।

बकौल मधुर, जब वो प्रोड्यूसर्स को अपनी कहानी सुनाते थे तो उनसे कहा जाता था कि ये तो कुछ ज़्यादा ही श्याम बेनेगल व गोविंद निहलानी टाइप की कहानी हैं।

ये सब चलता नहीं है। वो लोग मधुर से कहते थे कि कोई कमर्शियल फ़िल्म की कहानी लाओ। जब कमर्शियल फ़िल्म बनाकर कामयाब हो जाओगे तब कोई मैसेज बेस्ड फ़िल्म तुम बना सकते हो।

चूंकि मधुर भंडारकर उस वक्त बेरोजगार थे। और उन्हें हर हाल में एक ब्रेक चाहिए था। तो उन्होंने एक कमर्शियल फ़िल्म की स्क्रिप्ट तैयार की। वो फ़िल्म थी त्रिशक्ति। मधुर कहते हैं कि जब आप इनसिक्योर होते हैं तो जो कोई भी आपको कुछ बताता है, आप वही करने को तैयार हो जाते हैं।

मधुर से कहा गया कि एक्शन डालो, हैलिकॉप्टर का सीन डाल दो, आइटम नंबर डाल दो, बिकिनी सीन्स डाल दो। मधुर ने त्रिशक्ति में वैसा ही किया। मधुर कहते हैं कि उन्हें पता था कि ये फ़िल्म उनके लिए कुछ खास नहीं करने वाली है।

वही हुआ भी। 1999 में त्रिशक्ति रिलीज़ हुई थी। और बुरी तरह फ्लॉप भी हो गई थी। फ़िल्म इंडस्ट्री के कई लोगों ने मधुर भंडारकर का करियर खत्म घोषित कर दिया।

मधुर एक बार फिर से मुश्किलों में थे। कड़ा संघर्ष सामने था। मधुर ने बड़े स्टार्स के सेक्रेट्ररीज़ से जान-पहचान बनानी शुरू की। मधुर ने उनसे रिक्वेस्ट की कि वो लोग मधुर को भी फ़िल्मी पार्टीज़ में इनवाइट करें।

और मधुर ने ये सब इसलिए किया क्योंकि अब तक मधुर को अब तक अहसास हो गया था कि उन्हें कॉन्टैक्ट्स बनाने होंगे। जो दिखता है वही बिकता है।

मधुर बताते हैं कि फ़िल्मी पार्टीज़ में कई दफ़ा ऐसा हुआ जब उन्हें बहुत लज्जित महसूस हुआ। इन फ़िल्मी पार्टीज़ में कई ऐसे एक्टर्स मधुर को ऐसे मिले जिनसे मधुर ने बात करने की कोशिश की तो उन्होंने बस हैलो कहा और मुंह दूसरी तरफ़ घुमा लिया। उनमें से कुछ एक्टर्स तो ऐसे भी थे जिन्होंने आगे चलकर खुशी-खुशी मधुर भंडारकर की फ़िल्मों में काम किया।

मधुर कहते हैं कि उन पार्टीज़ में जाकर ही उन्हें इस फ़िल्म इंडस्ट्री का गेम समझ में आया। आपको बहुत प्रैक्टिकल होना पड़ता है। ये फ़िल्म इंडस्ट्री ऐसी है जहां हर रविवार को दोस्त और दुश्मन बनते-बदलते रहते हैं। इसलिए इस इंडस्ट्री पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

दो सालों बाद, 2001 में मधुर भंडारकर को चांदनी बार फ़िल्म बनाने का चांसमिला। एक ऐसी फ़िल्म जिसे मधुर भंडारकर दिल से बनाना चाहते थे। चांदनी बार रिलीज़ हुई। और फिर सबकुछ बदल गया। मधुर की लाइफ़ रातों रात फ़र्श से अर्श पर पहुंच गई।

फिर तो मधुर ने सत्ता, आन, पेज थ्री, कॉरपोरेट, ट्रैफ़िक सिग्नल, फैशन, जेल व हीरोइन जैसी बहुचर्चित फ़िल्में बनाई। और भी कुछ फ़िल्में बनाई। मधुर की फ़िल्म चांदनी बार ने कई नेशनल अवॉर्ड्स जीते। ट्रैफ़िक सिग्नल के लिए मधुर को नेशनल फ़िल्म अवॉर्ड फॉर बेस्ट डायरेक्शन मिला। और कुछ अवॉर्ड्स भी मधुर भंडारकर ने जीते। और मधुर भंडारकर भी फ़िल्म इंडस्ट्री के सक्सेसफ़ुल डायरेक्टर्स में से एक बन गए।

"उस वक्त मैं अपने करियर की कुछ बहुत बड़ी फिल्मों की शूटिंग कर रही थी और मेरी शादी भी होने वाली थी।। एक साल पहले ही मेरी ...
19/05/2026

"उस वक्त मैं अपने करियर की कुछ बहुत बड़ी फिल्मों की शूटिंग कर रही थी और मेरी शादी भी होने वाली थी।। एक साल पहले ही मेरी मां की मौत हुई थी। जब शादी की तारीख नज़दीक आ रही थी तब मुझे ख्याल आया कि मेरी मां गुज़र ही चुकी है। और अब शादी के बाद मेरा करियर भी खत्म ही हो जाएगा। मुझे खुश होने की कोई वजह नहीं दिख रही थी तब। एक दिन मैं अपनी सास के सामने रो पड़ी। मैंने उनसे अपनी दुविधा बताई। मैं धूमधाम से शादी नहीं करना चाहती थी। मेरी सास मान गई।"

एक्ट्रेस जूही चावला ने एक इंटरव्यू में अपनी शादी के बारे में जय मेहता से अपनी शादी के बारे में बात करते हुए ये सब कहा था। जूही चावला 1984 की मिस इंडिया हैं। आमिर खान के साथ फिल्म "कयामत से कयामत तक" से जूही चावला का फिल्म इंडस्ट्री में डेब्यू हुआ था। और उसके बाद उन्होंने एक से बढ़कर एक फिल्मों में काम किया। एक वक्त की टॉप एक्ट्रेसेज़ में जूही चावला गिनी जाती थी।

साल 1995 में जूही चावला ने इंडस्ट्रीलिस्ट जय मेहता से शादी की थी। जूही के दो बच्चे, बेटी जान्हवी और बेटा अर्जुन हैं। जिस वक्त जय मेहता से जूही की शादी हुई थी उस वक्त जूही की उम्र 29 साल थी। कुछ महीने पहले एक इंटरव्यू में जूही चावला ने अपनी शादी के बारे में बात की थी। उसी बातचीत के दौरान जूही ने बताया था कि क्यों उन्होंने एकदम सादगी भरे अंदाज़ में शादी की थी? क्यों उनकी शादी का मीडिया में बहुत ज़्यादा चर्चा नहीं हुआ था? जूही ने और क्या-क्या बताया था? चलिए जानते हैं।

जूही ने बताया था कि उनकी सास ने फैमिली के लोगों को इस बात के लिए राज़ी कर लिया कि शादी बड़े स्तर पर नहीं की जाएगी। हालांकि परिवार के कुछ लोग इससे खुश नहीं थे। लेकिन आखिरकरा सासू मां ने सबको मना ही लिया। पहले देश-विदेश में जूही-जय मेहता की शादी के इनविटेशन दिए गए थे। लेकिन सासू मां ने कोई दो हज़ार इनविटेशन कैंसिल किए। जबकी वो इनविटेशन भेजे जा चुके थे। जूही और जय की शादी उनके घर पर ही हुई। शादी में सिर्फ 80-90 लोग ही मौजूद थे।

जूही चावला की मां मोना चावला की मृत्यु उस वक्त हुई थी जब जूही शाहरुख के साथ किसी आउटडोर लोकेशन पर डुप्लीकेट फिल्म की शूटिंग के लिए गई हुई थी। जब जूही को अपनी मां की मृत्यु की खबर मिली तो वो बुरी तरह टूट गई। वो रोने लगी। उस वक्त शाहरुख खान व डुप्लीकेट के अन्य क्र्यू मेंबर्स ने जूही का बहुत सपोर्ट किया। जबकी जय मेहता, जिनसे तब जूही का अफेयर चल रहा था, वो भी जूही के साथ मजबूती से खड़े थे। जय मेहता जानते थे कि ऐसे समय में किसी पर क्या गुज़रती है।

दरअसल, जय मेहता की पहली पत्नी सुजाता बिरला एख प्लेन क्रैश में मारी गई थी। उस वक्त को याद करते हुए एक दफा CNN-News 18 को दिए इंटरव्यू में जूही चावला ने कहा था,"वो बहुत मुश्किल वक्त था मेरे लिए। मुझे लगा हर वो चीज़ मुझसे छिन जाएगी जिसे मैं प्यार करती हूं। फिर तो जहां भी मैं जाती थी, जय मेहता वहीं मुझे दिख जाते थे। वो हर जगह फूल, गिफ्ट्स और लैटर्स लेकर खड़े रहते। एक दिन जब मेरा जन्मदिन आया तो जय ने एक ट्रक गुलाब के फूल भेजे। मैं सोच रही थी कि इतने सारे गुलाब के फूलों का कोई क्या करेगा? मुझे इंप्रैस करने के लिए जय जो भी कर सकते थे उन्होंने किया। और फिर लगभग 1 साल बाद जय ने मुझे शादी के लिए प्रपोज़ किया।"

एक दफा राजीव मसंद को दिए इंटरव्यू में जूही ने बताया था कि वो अपनी शादी को प्राइवेट रखना चाहती थी। शुरुआत में वो नहीं चाहती थी कि किसी को भी उनकी शादी के बारे में पता चले। क्योंकि जब जूही की शादी हुई थी तब वो अपने करियर के शिखर पर थी। जूही को फ़िक्र थी कि शादी के बारे में अगर दुनिया को पता चलेगा तो उनका करियर प्रभावित होगा। हालांकि जब जूही गर्भवती हुई तो सबको पता चल ही गया कि जूही ने शादी कर ली है।

एक दफ़ा एक अमेरिकी ने इनका मज़ाक उड़ाते हुए कहा था कि कोई भी एशियन कभी भी उनके यहां की बॉडी बिल्डिंग चैंपियनशिप नहीं जीत...
19/05/2026

एक दफ़ा एक अमेरिकी ने इनका मज़ाक उड़ाते हुए कहा था कि कोई भी एशियन कभी भी उनके यहां की बॉडी बिल्डिंग चैंपियनशिप नहीं जीत सकता। उसकी वो बात इनके दिल पर लगी।

बॉडी तो इनकी भी तगड़ी थी उस वक्त। तो इन्होंने और कड़ी मेहनत शुरू कर दी। और अगले साल वाकई में इन्होंने उस अमेरिकी बॉडी बिल्डिंग चैंपियनशिप को जीतकर दिखाया।

इसिलिए तो कहते हैं कि इंसान अगर ठान ले तो दुर्लभ से दुर्लभ ख्वाब भी पूरे कर सकता है। फिर तो चैंपियनशिप्स जीतने का इनका सिलसिला कुछ ऐसे शुरू हुआ कि इन्होंने अमेरिका में कई और बॉडी बिल्डिंग चैंपियनशिप्स भी अपने नाम की।

एक बहुत प्रतिष्ठित बॉडी बिल्डिंग चैंपियनशिप है अमेरिका की जिसे मिस्टर न्यूयॉर्क कहते हैं। ये साहब उस चैंपियनशिप को भी जीत चुके हैं। और वो पहले एशियन हैं ये उस चैंपियनशिप को जीतने वाले।

इनका नाम है लोपसांग। 02 अक्टूबर 1966 को दार्जिलिंग में लोपसांग का जन्म हुआ था। इन्होंने भी कुछ बॉलीवुड फ़िल्मों में काम किया है। जैसे कि अजय देवगन वाली कयामत।

उस फ़िल्म में ये खलनायकों के ग्रुप के मेंबर थे। कुछ दिन पहले भी इनके बारे में एक पोस्ट की थी हमने। इन्हें फ़िरोज़ खान फ़िल्मों में लेकर आए थे।

जानशीन फ़िल्म में लोपसांग जी ने पहली दफ़ा काम किया था। फ़िरोज़ खान ने इनके बारे में एक अखबार में छपा आर्टिकल पढ़ा था। उस आर्टिकल में इनकी तस्वीर देखकर फ़िरोज़ खान इनसे बहुत प्रभावित हुए थे।

जानशीन में उन्होंने लोपसांग को शेर खान के रोल में लिया था। फ़िरोज़ खान इन्हें और दो फ़िल्मों में भी लेने वाले थे। मगर फ़िरोज़ खान जी की मृत्यु हो गई तो वो फ़िल्में कभी बन ही नहीं पाई।

यहां ये भी जान लीजिए कि जानशीन इनकी पहली रिलीज़्ड फ़िल्म नहीं थी। इनकी पहली रिलीज़्ड फ़िल्म थी अक्षय-करीना की तलाश। तलाश में लोपसांग ने करीना कपूर के बॉडीगार्ड का किरदार निभाया था।

इनके जीवन की विस्तृत कहानी मैंने लिखी थी कुछ साल पहले। इनकी जीवनी का वो लेख आपको कमेंट सेक्शन में मिल जाएगा। ज़रूर पढ़िएगा। इनकी कहानी बहुत कमाल है। शानदार है। जानने लायक है।

किसी तरह इंस्टाग्राम के माध्यम से मुझे इनका नंबर मिल गया था। तब व्हाट्सएप कॉल पर मेरी इनसे बात हुई थी। क्योंकि तब ये अमेरिका में ही थे। इन्होंने ही अपनी पूरी कहानी बताई थी मुझे।

और तब इन्होंने ये भी बताया था कि कैसे एक बार आवारा पागल दीवाना फ़िल्म में काम करने के दौरान फ़िरोज़ नाडियाडवाला से इनकी लड़ाई हो गई थी।

तब सुनील शेट्टी भी फ़िरोज़ नाडियाडवाला की तरफ़ से बोल रहे थे, जिस कारण सुनील शेट्टी से भी लोपसांग की बहस हो गई थी। और आखिरकार लोपसांग ने आवारा पागल दीवाना फ़िल्म छोड़ दी थी।

साथियों लोपसांग की कहानी ज़रूर पढ़िएगा। क्योंकि इन्होंने अपने करियर में एक बहुत बड़ी भूल भी की थी। अगर ये वो भूल ना करते तो शायद इनका करियर चल जाता।

क्योंकि इन्हें एक ऐसा रोल ऑफ़र हुआ था जिसमें इन्हें साउथ के एक बहुत बड़े स्टार के खिलाफ़ मुख्य विलेन का किरदार निभाना था। और इन्हें तब लगा था कि वो कोई स्टार नहीं, कोई मामूली एक्टर होगा।

ये दरअसल उस स्टार को पहचानते ही नहीं थे। और फिर एक स्थिति इनके जीवन में ऐसी भी आ खड़ी हुई कि ऋतिक रोशन की एक बड़ी फ़िल्म में ये चाहकर भी काम नहीं कर सके। पढ़िएगा ये लेख। इनके बारे में बहुत सारी जानकारियां आपको मिलेंगी।

खामोशी से दुनिया छोड़ गया ये कलाकार। जिसका डेब्यू हुआ था जैकी श्रॉफ़ के साथ। और जिसने अजय देवगन की डेब्यू फ़िल्म व शाहरु...
19/05/2026

खामोशी से दुनिया छोड़ गया ये कलाकार। जिसका डेब्यू हुआ था जैकी श्रॉफ़ के साथ। और जिसने अजय देवगन की डेब्यू फ़िल्म व शाहरुख खान की डेब्यू फ़िल्म में भी काम किया था। सलीम खान नाम था इनका। मगर फ़िल्मों में इन्हें नाम दिया जाता था डिंग डोंग। और फ़िल्म इंडस्ट्री के लोग इन्हें कहते थे सलीम खान डिंग डोंग। कई फ़िल्मों में इन्होंने काम किया था।

सलमान संग इनकी बढ़िया दोस्ती थी। सलमान के साथ ही डिंग डोंग की आखिरी फ़िल्म भी आई थी। उस फ़िल्म का नाम था 'शादी करके फंस गया।' वो फ़िल्म साल 2006 में आई थी। और साल 2011 में सलीम खान डिंग डोंग की मृत्यु हो गई थी। सलीम खान डिंग डोंग को एक तेज़ हार्ट अटैक आया था।

सलीम खान मुंबई में पैदा हुए थे। ये मोटे थे। और लंबी-चौड़ी कदकाठी के थे। छह फ़ीट से ज़्यादा हाइट थी इनकी। परिवार इनका आर्थिक रूप से मजबूत था। इसलिए अच्छे स्कूलों में पढ़ाई हुई। और चूंकि अपने माता-पिता की ये इकलौती औलाद थे, तो इनकी हर ख्वाहिश पूरी की जाती थी। इन्हें बाइकिंग का शौक था।

तो इनके पास उस वक्त कई बाइक्स थी। कारें भी थी। सलीम खान डिंग डोंग को रेसिंग पसंद थी। और ये तीन दफा महाराष्ट्र बाइक रेसिंग चैंपियनशिप जीत चुके थे। इन्हें अपनी बाइक्स पर स्टंट करने का बड़ा शौक था और इनका यही शौक आखिरकार इन्हें फिल्मों में भी ले आया।

सलीम खान डिंग डोंग की कहानी काफ़ी पहले हमने लिखी थी। इंटरनेट पर इनके बारे में वैसे तो बहुत अधिक जानकारियां उपलब्ध नहीं हैं। लेकिन जो भी इधर-उधर थोड़ी जानकारियां हैं वो हमने अपने एक लेख में सहेजी थी काफ़ी पहले। वो लेख आपको कमेंट सेक्शन में मिल जाएगा। उसे ज़रूर पढ़िएगा। इनके बारे में कुछ अच्छा जानने को मिलेगा।

सारी बात रिस्क लेने की है। अस्सी प्रतिशत से भी ज़्यादा लोग जीवन में रिस्क उठाने का साहस नहीं कर पाते हैं। क्योंकि लोगों ...
19/05/2026

सारी बात रिस्क लेने की है। अस्सी प्रतिशत से भी ज़्यादा लोग जीवन में रिस्क उठाने का साहस नहीं कर पाते हैं। क्योंकि लोगों को असफ़ल होते देखकर रिस्क लेने की हिम्मत बचती ही नहीं। मगर कुछ लोग होते हैं जो रिस्क उठाकर ही अपने ख्वाब पूरा कर पाते हैं। बाबा सहगल वैसे लोगों में से एक हैं। बाबा एक अच्छी-खासी सरकारी नौकरी कर रहे थे। लाखों युवा सरकारी नौकरी पाने की कोशिश करते हैं लेकिन उन्हें सरकारी नौकरी मिल नहीं पाती। इसलिए जिन लोगों को सरकारी नौकरी मिलती है वो कभी उसे छोड़ने के बारे में ख्वाब में भी नहीं सोचते।

बाबा को म्यूज़िक में नाम बनाना था। मशहूर होना था। मगर उस नौकरी में वो सब मुमकिन नहीं था। एक दिन जब बोरियत बेइंतिहा हो गई तो बाबा सहगल ने किराए के अपने फ्लैट पर पहुंचक अपने घर फोन करके माता-पिता को बताया कि मैं ये नौकरी छोड़कर मुंबई जा रहा हूं। फोन मां ने उठाया था। बेटे की नौकरी छोड़ने की बात ने उन्हें टेंशन में ला दिया। मां ने बहुत कोशिश की बेटे को समझाने की। लेकिन बाबा वापस नौकरी पर जाने को तैयार नहीं थे। उस ज़माने में इनके पास एक मारुति 800 हुआ करती थी। तो अगले दिन ऑफ़िस ना जाकर बाबा ने अपनी मारुति 800 दिल्ली-मुंबई हाइवे पर चढ़ा दी। वैसे बाबा सहगल की मारुति 800 की भी एक कहानी है। वो इनकी जीवनी में आपको पढ़ने को मिलेगी।

मुंबई में बाबा की किस्मत ने उनका साथ दिया। उनका एक दोस्त एक म्यूज़िक कंपनी में बढ़िया ओहदे पर काम कर रहा था। उस म्यूज़िक कंपनी का नाम था मैग्नासाउंड। अपने उस दोस्त की मदद से बाबा ने दो एल्बम्स रिलीज़ किए। मगर उस ज़माने में पॉप म्यूज़िक कल्चर भारत में बहुत सीमित था तो बाबा सहगल की वो एल्बम्स कुछ खास प्रदर्शन ना कर सकी। बल्कि कहना चाहिए कि बुरी तरह फ्लॉप हो गई। फिर तो मैग्नासाउंड वालों ने भी बाबा सहगल से और एल्बम्स बनाने में मदद करने से इन्कार कर दिया। दूसरी तरफ़ इनके माता-पिता भी लखनऊ में परेशान हो रहे थे।

पिता तो तब भी बाबा पर दबाव डाल रहे थे ये कहकर कि अपनी नौकरी फिर से जॉइन कर लो। अभी संभावनाएं हैं वो नौकरी फिर से जॉइन करने की। मगर बाबा अभी भी हार नहीं मानना चाहते थे। इसलिए उन्होंने अपने पिता से कह दिया कि वो वापस नहीं आएंगे। मगर बाबा को मन ही मन टेंशन भी हो रही थी कि वो अपनी मंज़िल हासिल कैसे करेंगे? उसी दौरान बाबा की ज़िंदगी में एंट्री हुई MTV की। उस दौरान ही MTV भारत में लॉन्च हुआ था। और बाबा कहते हैं कि वो MTV का भारत में दूसरा दिन ही था जब उन्होंने पहली बार MTV देखा था।

MTV पर बाबा ने एक विदेशी म्यूज़िक वीडियो देखा था। वो म्यूज़िक वीडियो मशहूर रैपर वनीला आइस का एक ट्रैक था जिसके बोल थे 'आइस आइस बेबी।' बाबा बहुत प्रभावित हुए वो म्यूज़िक वीडियो देखकर। उसकी धुन उनके दिमाग में बस गई। अगले ही दिन बाबा सहगल पहुंचे सेंटोर होटेल जो जुहू में था। बाबा ने वहां एक कमरा किराए पर लिया। फिर होटेल के पूल के पास बैठकर बाबा एक नोटबुक में कुछ लिखने लगे। बाबा कुछ लाइनें लिख रहे थे। वो लाइनें पूरी करने के बाद बाबा एक बार फिर से पहुंचे मैग्नासाउंड कंपनी के डायरेक्टर के पास। बाबा ने अपनी लिखी लाइनें उन्हें सुनाई। और वो लाइनें उन्हें बहुत पसंद आई। उन्होंने बाबा से कहा कि तैयारी कर लो। हम एक और एल्बम बनाएंगे।

दो महीने बाद बाबा की वो एल्बम रिलीज़ हुई। उस एल्बम का नाम था ठंडा ठंडा पानी। इस बार बाबा की किस्मत चमकी। और क्या ज़बरदस्त चमकी। टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने फ्रंट पेज पर बाबा सहगल पर बेस्ड् एक आर्टिकल छापा, जिसमें उन्होंने बाबा की एक बड़ी सी तस्वीर भी लगाई थी। उस आर्टिकल की हैडिंग थी,"Baba Sehgal's Thanda Thanda Pani create waves in Indian music industry." इसके बाद तो बाबा सहगल अगले कुछ सालों तक खूब चले। बाबा को फ़िल्मों के लिए भी गाने के मौके मिले। मगर तब ही अंडरवर्ल्ड वालों ने भी बाबा पर अपनी काली नज़रें डाल दी। बाबा ने भारत छोड़ दिया।

भारत छोड़कर जाने के बाद भी बाबा सहगल की मुसीबतें कम नहीं हुई। जिस देश में वो गए थे वहां भी उनका सारा निवेश डूब गया। बाबा को मजबूरी फिर से भारत लौटना पड़ा। फिर से स्ट्रगल करना पड़ा। फिर से काम मांगने के लिए दर-दर भटकना पड़ा। उस मुश्किल वक्त में साउथ के एक बहुत बड़े स्टार ने बाबा की मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाया। कौन था साउथ का वो स्टार जिसने बाबा सहगल को मुसीबतों से बाहर निकाला था? अंडरवर्ल्ड से जान छुड़ाने के लिए बाबा सहगल किस देश में जाकर बस गए थे? और अमेरिका में बाबा क्या सीखने गए थे? ये सब आपको इनकी जीवनी में पता चलेगा। इनकी जीवनी वाला लेख कमेंट सेक्शन में मौजूद है। पढ़िए उसे। और भी बहुत सी रोचक बातें आपको बाबा सहगल के बारे में मालूम होंगी।

90 के दशक में किसी फ़िल्म के सेट पर फराह नाज़ की मुलाकात विंदू दारा सिंह से हुई थी। ये वो दौर था जब फराह नाज़ का करियर ख...
19/05/2026

90 के दशक में किसी फ़िल्म के सेट पर फराह नाज़ की मुलाकात विंदू दारा सिंह से हुई थी। ये वो दौर था जब फराह नाज़ का करियर खात्मे की तरफ़ बढ़ रहा था। ज़ाहिर है, उस वक्त फराह नाज़ बहुत फ्रस्ट्रेट थी।

विंदू से फराह की दोस्ती हो गई। और उस मुश्किल वक्त में फराह को विंदू दारा सिंह ने बहुत इमोशनल सपोर्ट दिया। और फिर दोनों एक-दूजे को इश्क भी करने लगे। मगर जब इन दोनों ने शादी करने की बात अपने-अपने घर बताई तो इन दोनों के ही घरवाले तैयार नहीं हुए।

दरअसल, फराह नाज़ एक नामी एक्ट्रेस थी। जबकी विंदू दारा सिंह स्ट्रगलर थे। फराह की मां नहीं चाहती थी कि वो किसी ऐसे लड़के से शादी करें जिसका करियर भी सैटल्ड ना हो। मां चाहती थी कि फराह किसी वैल-सैटल्ड पुरुष से विवाह करें।

दूसरी तरफ़ दारा सिंह जी भी नहीं चाहते थे कि उनका बेटा किसी फ़िल्मी लड़की से शादी करे। दारा सिंह जी किसी घरेलू लड़की को अपनी बहू बनाना चाहते थे। घर वालों की नाराज़गी को देखते हुए विंदू और फराह नाज़ ने एक-दूजे से अलग होने का फ़ैसला किया।

दोनों ने तय किया कि अब वो एक-दूजे से ना तो मिलेंगे। और ना ही बात करेंगे। ब्रेकअप के कुछ ही दिन बाद विंदू किसी फ़िल्म के शूट के लिए तमिलनाड्डु निकल गए। और काफ़ी दिनों तक विंदू व फराह नाज़ की बातचीत नहीं हुई। लेकिन ये दोनों मन ही मन बेचैन ज़रूर रहते थे।

और दोनों को लगा जैसे ये एक-दूजे के बिना नहीं रह सकेंगे। विंदू जब वापस मुंबई लौटे तो बड़ी बेचैनी मन में लिए वो फराह से मिले। ठीक वैसी ही बेचैनी फराह के मन में भी थी। इसलिए इन्होंने तय किया कि पेरेंट्स मानें या ना मानें। ये तो शादी करके रहेंगे। इनकी ज़िद देख इनके माता पिता को झुकना ही पड़ा।

आखिरकार साल 1997 में विंदू दारा सिंह और फराह नाज़ ने शादी कर ली। और अगले साल ही फराह ने विंदू के बेटे को जन्म दिया जिसका नाम रखा गया फतेह। इन दोनों को लग रहा था कि इनके जीवन में सबकुछ सही है।

लेकिन वैसा कुछ था नहीं। क्योंकि दोनों ही बहुत ईगो वाले भी थे। और इन दोनों की ईगो ने ही इनकी शादी भी खत्म करा दी। दोनों के बीच झगड़े होने शुरू हो गए। और आखिरकार 2002 में फराह ने विंदू का घर छोड़ दिया और अकेले रहने लगी।

फराह ने तो विंदू से अलग होने के बारे में मीडिया में कोई बात नहीं की। मगर जब मीडिया वालों को पता चला कि फराह और विंदू दारा सिंह अलग रह रहे हैं तो वो विंदू के पास गए। विंदू ने उनसे कह दिया कि वो किसी आज़ाद पंछी जैसा महसूस कर रहे हैं अब।

ये बात शायद फराह को बहुत बुरी लगी। और 2003 में विंदू व फराह ने कानूनन तलाक ले लिया और अपनी राहें हमेशा के लिए जुदा कर ली। बेटे फतेह की कस्टडी विंदू दारा सिंह को मिली।

इत्तेफ़ाक से इसी साल फराह की मुलाकात एक्टर सुमीत सिंह से हुई। दोनों को लगा कि उनके बीच कुछ कनैक्शन है। और उसी साल, यानि 2003 में ही फराह नाज़ ने सुमीत सिंह से शादी कर ली। शादी के कुछ साल बाद फराह का बेटा फतेह भी उनके साथ ही रहने लगा।

सुमीत से शादी करने के बाद फराह ने हलचल व शिखर नामक दो फ़िल्मों में एक्टिंग भी की। जबकी साल 2006 में विंदू दारा सिंह ने भी एक रशियल मॉडल दीना उमारोवा से शादी कर ली। उनसे विंदू को एक बेटी हुई है।

विंदू दारा सिंह और फराह नाज़, दोनों ही अब अपने-अपने जीवन में सुखी हैं। और अच्छी ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं। और इन दोनों के बीच भी दोस्ती है। क्योंकि बेटे फ़तेह को लेकर इन दोनों के बीच अभी भी बातचीत होती रहती है।

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