Lucknow Cinephiles

Lucknow Cinephiles A forum to watch and discuss films collectively.

'लखनऊ सिनेफ़ाइल्‍स' की शुरुआत ऐसे आग्रही सिनेप्रेमियों द्वारा की गयी है जो सिनेमा को जीवन के यथार्थ के सभी पहलुओं के चित्रण का सशक्‍ततम कलामाध्‍यम मानते हैं। हम ऐसे सिनेमा को लोगों के बीच ले जाने के लिए प्रतिबद्ध हैं जो संघर्षरत मनुष्‍य के जीवन, संघर्ष और स्‍वप्‍नों को सामने लाता है। लखनऊ में ऐसे उत्‍सुक दर्शकों के बीच हम विश्‍व और भारतीय सिनेमा की उत्‍कृष्‍ट सिनेकृतियों का प्रदर्शन और उनके विभिन्

‍न पक्षों पर चर्चाओं का नियमित रूप से आयोजन करते रहेंगे। साथ ही, हम समय-समय पर फ़ि‍ल्‍म कला के विविध आयामों, सिनेमा के इतिहास आदि पर परिचर्चा, व्‍याख्‍यान, वर्कशॉप आदि का भी आयोजन करेंगे।

12/04/2026

दोस्तो, कुछ अपरिहार्य कारणों से आज फ़िल्म शो और चर्चा का कार्यक्रम हमें रद्द करना पड़ रहा है। नई तारीख़ के बारे में हम जल्द ही सूचित करेंगे।

दोस्तो, लखनऊ सिनेफ़ाइल्स के टेलीग्राम चैनल पर आज हमने ट्यूनिशिया की निर्देशक काउथर बेन-हानिया की फ़िल्म ‘द वॉयस ऑफ़ हिन्...
30/03/2026

दोस्तो, लखनऊ सिनेफ़ाइल्स के टेलीग्राम चैनल पर आज हमने ट्यूनिशिया की निर्देशक काउथर बेन-हानिया की फ़िल्म ‘द वॉयस ऑफ़ हिन्द रजब’ शेयर की है। फ़िल्म के अंग्रेज़ी सबटाइटल्स वीडियो में शामिल हैं।

हमारे टेलीग्राम चैनल से जुड़ने का लिंक पोस्ट के अन्त में दिया है।

फ़िल्म का संक्षिप्त परिचय

जनवरी 2024 में इज़रायली सेना की गोलियों की शिकार हुई ग़ज़ा की 6 साल की बच्ची हिन्द रजब और उसे बचाने की कोशिश कर रहे रेड क्रिसेंट के वॉलंटियर्स की कहानी को एक डॉक्युड्रामा के तौर पर पेश करने वाली यह फ़िल्म दर्शकों को निःशब्द और निस्तब्ध कर देती है। डेढ़ घंटे की पूरी फ़िल्म दो कमरों में फ़ोन पर बात कर रहे 4-5 किरदारों और हिन्द रजब की रिकॉर्डेड आवाज़ पर केन्द्रित है लेकिन आप ज़रा देर के लिए भी सीट से उठ नहीं सकते।

फ़िल्म में कहीं इज़रायल के बारे में सीधे कुछ नहीं कहा गया है लेकिन यह आपको ग़ज़ा में इज़रायली बर्बरता के प्रति गहरे आक्रोश से भर देती है। पूरी फ़िल्म वेस्ट बैंक के रामल्ला शहर में स्थित फ़िलिस्तीनी रेड क्रिसेंट के इमरजेंसी सेंटर में चलती है। 29 जनवरी 2024 को, ग़ज़ा शहर के पश्चिमी हिस्से पर इज़राइली सेना के क़ब्ज़े के बाद वहाँ रहने वाले लोगों को जगह खाली करने के लिए कहा गया था। लगातार गोलीबारी के बीच जान बचाकर भाग रहे लोग मदद के लिए इमरजेंसी सेंटर में फ़ोन करते हैं।

एक वॉलंटियर उमर के पास छह साल की बच्ची हिन्द रजब का फ़ोन आता है – डरी-सहमी आवाज़ में वह बताती है कि वह कार में अकेली ज़िन्दा बची है। उसके परिवार के सभी लोग गोलियों से मारे गये हैं। अपनी साथी राना के साथ मिलकर, वह उस बच्ची को उस भयानक हालात से बचाने के लिए हर मुमकिन कोशिश करता है। एक बचाव दल पास में ही मौजूद है, लेकिन वे अपनी एम्बुलेंस लेकर सीधे वहाँ नहीं पहुँच सकते। इसके लिए इज़राइली सेना से पहले वहाँ तक जाने के रूट की मंज़ूरी और फिर जाने की इजाज़त मिलना ज़रूरी है। इसी कोशिश में घंटों बीतते जाते हैं – हिन्द अपने परिजनों के मृत शरीरों के नीचे दबी हुई है और उनके ख़ून से भीगी है।

आख़िरकार जब इजाज़त मिलती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। हिन्द रजब के साथ कॉल की वॉयस रिकॉर्डिंग उस घटना के कुछ ही समय बाद वायरल हो गई थी। उस रिकॉर्डिंग और घटनाओं के वास्तविक फ़ुटेज के साथ इमरजेंसी सेंटर के वॉलंटियर्स के अभिनीत किए गए दृश्यों को निर्देशक काउथर बेन-हानिया ने बहुत प्रभावी ढंग से मिलाया है।

बेन-हानिया ने इसके बारे में कहा है : “हिंसा से भरी तस्वीरें हमारी स्क्रीन्स, हमारी टाइमलाइन्स और हमारे फ़ोन्स पर हर जगह मौजूद हैं। लेकिन मैं उस चीज़ को सामने लाना चाहती थी, जो आम तौर पर दूर बैठे हम लोग नहीं देख पाते। वह 'अदृश्य' पहलू : भयावह इन्तज़ार, डर, और मदद नहीं पहुँचने पर छा जाने वाला असहनीय सन्नाटा। कभी-कभी, जो चीज़ें हमें दिखाई नहीं देतीं, वे उन चीज़ों से कहीं ज़्यादा दिल दहला देने वाली होती हैं जो हमें दिखाई देती हैं। इस फ़िल्म का मूल-भाव बहुत ही सीधा-सादा है, लेकिन उसे सहन कर पाना बेहद मुश्किल है। मैं ऐसी दुनिया को स्वीकार नहीं कर सकती, जहाँ कोई बच्चा मदद के लिए पुकारे और कोई भी उसकी मदद न कर पाये। वह दर्द, वह नाकामी – हम सभी की साझा नाकामी है।”

ट्यूनीशिया और फ़्रांस की यह साझा प्रस्तुति है और दुनिया के कई बड़े फ़िल्मकार और अभिनेता एग्ज़िक्यूटिव प्रोड्यूसर के रूप में इससे जुड़े हैं, जिनमें ब्रैड पिट, जोक्विन फ़ीनिक्स, रूनी मारा, जोनाथन ग्लेज़र और अल्फ़ोंसो कुएरॉन जैसे नाम शामिल हैं। वेनिस फ़िल्म फ़ेस्टिवल में 'सिल्वर लायन ग्रैंड जूरी प्राइज़' की विजेता। 98वें एकेडमी अवॉर्ड्स के लिए ट्यूनीशिया की ओर से आधिकारिक प्रविष्टि। 'बेस्ट इंटरनेशनल फ़ीचर फ़िल्म' श्रेणी में नामांकित।

इस फ़िल्म के हिन्दी सबटाइटल्स नहीं तैयार किये जा सके हैं क्योंकि अंग्रेज़ी सबटाइटल्स की अलग से फ़ाइल नहीं मिल सकी है। अंग्रेज़ी सबटाइटल्स वीडियो में ही शामिल हैं। जैसे ही हिन्दी सबटाइटल्स हम तैयार कर पाये, हम टेलीग्राम चैलन में शेयर कर देंगे।

अगर आप अब तक हमारे चैनल से नहीं जुड़े हैं, तो नीचे दिए लिंक के ज़रिए आप इस टेलीग्राम चैनल से जुड़ सकते हैं। अगर कोई मुश्किल आये तो अपना नाम और नम्बर हमें इनबॉक्स या कमेंट में भेजें, हम आपको जोड़ देंगे।
टेलीग्राम चैनल का लिंक : https://t.me/LkoCinephiles

आज शाम लखनऊ सिनेफ़ाइल्स में हमने ट्यूनिशिया की निर्देशक काउथर बेन-हानिया की फ़िल्म ‘द वॉयस ऑफ़ हिन्द रजब’ देखी और उसके बा...
29/03/2026

आज शाम लखनऊ सिनेफ़ाइल्स में हमने ट्यूनिशिया की निर्देशक काउथर बेन-हानिया की फ़िल्म ‘द वॉयस ऑफ़ हिन्द रजब’ देखी और उसके बाद फ़िल्म पर और साथ ही फ़िलिस्तीन व इज़रायल के सवाल पर काफ़ी गर्मागर्म और विस्तृत चर्चा हुई।

शुरू में फ़िल्म का परिचय देते हुए सत्यम ने कहा कि यह फ़िल्म पूरी दुनिया में देखी और सराही जा रही है लेकिन हमारे देश के लोग इसे देखने से वंचित हैं क्योंकि मोदी सरकार ने यह कहते हुए इसे थिएटरों में दिखाने की इजाज़त नहीं दी है कि इससे इज़रायल, यानी फ़ादरलैंड के साथ उसके रिश्ते ख़राब हो जायेंगे। यह बेहद हास्यास्पद तर्क है क्योंकि ख़ुद इज़रायल के फ़ादरलैंड अमेरिका में इसे न केवल दिखाया जा रहा है बल्कि इसे ऑस्कर पुरस्कार के लिए भी नामांकित किया गया था।

जनवरी 2024 में इज़रायली सेना की गोलियों की शिकार हुई ग़ज़ा की 6 साल की बच्ची हिन्द रजब और उसे बचाने की कोशिश कर रहे रेड क्रिसेंट के वॉलंटियर्स की कहानी को एक डॉक्युड्रामा के तौर पर पेश करने वाली यह फ़िल्म दर्शकों को निःशब्द और निस्तब्ध कर देती है। डेढ़ घंटे की पूरी फ़िल्म दो कमरों में फ़ोन पर बात कर रहे 4-5 किरदारों और हिन्द रजब की रिकॉर्डेड आवाज़ पर केन्द्रित है लेकिन आप ज़रा देर के लिए भी सीट से उठ नहीं सकते। फ़िल्म इस क़दर झकझोर देती है कि ख़त्म होने के बाद काफ़ी देर तक कोई कुछ बोल नहीं सका।

फ़िल्म में कहीं इज़रायल के बारे में सीधे कुछ नहीं कहा गया है लेकिन यह आपको ग़ज़ा में इज़रायली बर्बरता के प्रति गहरे आक्रोश से भर देती है। पूरी फ़िल्म वेस्ट बैंक के रामल्ला शहर में स्थित फ़िलिस्तीनी रेड क्रिसेंट के इमरजेंसी सेंटर में चलती है। 29 जनवरी 2024 को, ग़ज़ा शहर के पश्चिमी हिस्से पर इज़राइली सेना के क़ब्ज़े के बाद वहाँ रहने वाले लोगों को जगह खाली करने के लिए कहा गया था। लगातार गोलीबारी के बीच जान बचाकर भाग रहे लोग मदद के लिए इमरजेंसी सेंटर में फ़ोन करते हैं।

एक वॉलंटियर उमर के पास छह साल की बच्ची हिन्द रजब का फ़ोन आता है – डरी-सहमी आवाज़ में वह बताती है कि वह कार में अकेली ज़िन्दा बची है। उसके परिवार के सभी लोग गोलियों से मारे गये हैं। अपनी साथी राना के साथ मिलकर, वह उस बच्ची को उस भयानक हालात से बचाने के लिए हर मुमकिन कोशिश करता है। एक बचाव दल पास में ही मौजूद है, लेकिन वे अपनी एम्बुलेंस लेकर सीधे वहाँ नहीं पहुँच सकते। इसके लिए इज़राइली सेना से पहले वहाँ तक जाने के रूट की मंज़ूरी और फिर जाने की इजाज़त मिलना ज़रूरी है। इसी कोशिश में घंटों बीतते जाते हैं – हिन्द अपने परिजनों के मृत शरीरों के नीचे दबी हुई है और उनके ख़ून से भीगी है।

आख़िरकार जब इजाज़त मिलती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। हिन्द रजब के साथ कॉल की वॉयस रिकॉर्डिंग उस घटना के कुछ ही समय बाद वायरल हो गई थी। उस रिकॉर्डिंग और घटनाओं के वास्तविक फ़ुटेज के साथ इमरजेंसी सेंटर के वॉलंटियर्स के अभिनीत किए गए दृश्यों को निर्देशक काउथर बेन-हानिया ने बहुत प्रभावी ढंग से मिलाया है।

बेन-हानिया ने इसके बारे में कहा है : “हिंसा से भरी तस्वीरें हमारी स्क्रीन्स, हमारी टाइमलाइन्स और हमारे फ़ोन्स पर हर जगह मौजूद हैं। लेकिन मैं उस चीज़ को सामने लाना चाहती थी, जो आम तौर पर दूर बैठे हम लोग नहीं देख पाते। वह 'अदृश्य' पहलू : भयावह इन्तज़ार, डर, और मदद नहीं पहुँचने पर छा जाने वाला असहनीय सन्नाटा। कभी-कभी, जो चीज़ें हमें दिखाई नहीं देतीं, वे उन चीज़ों से कहीं ज़्यादा दिल दहला देने वाली होती हैं जो हमें दिखाई देती हैं। इस फ़िल्म का मूल-भाव बहुत ही सीधा-सादा है, लेकिन उसे सहन कर पाना बेहद मुश्किल है। मैं ऐसी दुनिया को स्वीकार नहीं कर सकती, जहाँ कोई बच्चा मदद के लिए पुकारे और कोई भी उसकी मदद न कर पाये। वह दर्द, वह नाकामी – हम सभी की साझा नाकामी है।”

फ़िल्म के बाद हुई बातचीत में इन पहलुओं पर चर्चा के साथ ही फ़िलिस्तीन की आज़ादी के संघर्ष, भारत में पिछले डेढ़ दशक के दौरान इज़रायल के साथ सरकार के बदले संबंधों और लगातार प्रॉपेगैंडा के कारण फ़िलिस्तीन के प्रति समाज के बड़े हिस्से में फैले झूठ और नफ़रत पर भी चर्चा हुई। पश्चिम एशिया में जारी जंग, साम्राज्यवादी नीतियों और समाज में फैले इस्लामोफ़ोबिया आदि पर भी बातें हुईं।

लखनऊ विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय क़ानून के प्रोफ़ेसर भानु प्रताप ने विस्तार से बताया कि किस तरह अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों की ग़लत व्याख्या के ज़रिए इज़रायली राज्य के गठन की ज़मीन तैयार की गई और फ़िलिस्तीन को राज्य के दर्जे से वंचित किया गया।

सत्यम, असग़र मेहदी, ज्योति नन्दा, यशू, फ़रज़ाना मेहदी, ऋषिका, नदीम साहिल, उज्ज्वल सेठ, तथागत, संस्कृति पाल, आकाश शर्मा, तनवीर आलम, पुनीत, लालचन्द्र, रामविलास, सन्दीप नेगी, रुचि साहू, भूमिका बडोला, मो. अहबाब, प्रार्थना, विकास, राजू आदि ने भी बातचीत में हिस्सा लिया। फ़िलिस्तीन और इज़रायल के इतिहास और राजनीति से जुड़े सवालों पर आगे अलग से विस्तृत चर्चा रखे जाने पर भी सहमति बनी।

इस मौक़े पर ‘जनचेतना’ की ओर से फ़िलिस्तीन के मसले पर कुछ चुनिन्दा किताबों, लेखों और पर्चों की प्रदर्शनी भी लगाई गई थी।

इस फ़िल्म के हिन्दी सबटाइटल्स नहीं तैयार किये जा सके थे क्योंकि अंग्रेज़ी सबटाइटल्स की अलग से फ़ाइल मिलना सम्भव नहीं हुआ। अंग्रेज़ी सबटाइटल्स वीडियो में ही एंबेड किये गये हैं। हालाँकि इसकी कमी किसी दर्शक को खटकी नहीं। कल हम इसे ‘लखनऊ सिनेफ़ाइल्स’ के टेलीग्राम चैनल पर भी उपलब्ध करा देंगे।

याददिहानी, आज शाम 4 बजे...
29/03/2026

याददिहानी, आज शाम 4 बजे...

29 जनवरी 2024 को, ग़ज़ा शहर के पश्चिमी हिस्से पर इज़राइली सेना के क़ब्ज़े के बाद वहाँ रहने वाले लोगों को जगह खाली करने क...
28/03/2026

29 जनवरी 2024 को, ग़ज़ा शहर के पश्चिमी हिस्से पर इज़राइली सेना के क़ब्ज़े के बाद वहाँ रहने वाले लोगों को जगह खाली करने के लिए कहा गया। इसके साथ ही रामल्ला में स्थित फ़िलिस्तीनी रेड क्रिसेंट के इमरजेंसी सेंटर में फ़ोन लगातार बजने शुरू हो गये।

एक वॉलंटियर उमर के पास छह साल की बच्ची हिन्द रजब का फ़ोन आता है – वह एक ऐसी कार में अकेली ज़िन्दा बची थी जिसे गोलियों से छलनी कर दिया गया था। अपनी साथी राना के साथ मिलकर, वह उस बेबस और डरी-सहमी बच्ची को उस भयानक हालात से बचाने के लिए हर मुमकिन कोशिश करता है। एक बचाव दल पास में ही मौजूद है, लेकिन वे अपनी एम्बुलेंस लेकर सीधे वहाँ नहीं पहुँच सकते। इसके लिए इज़राइली सेना से पहले ‘पास’ लेना ज़रूरी है, और इसमें समय लगता है – समय, जो हिन्द के पास नहीं है...

अकादेमी अवॉर्ड के लिए नामांकित फ़िल्मकार कूथर बेन हानिया ने इस घटना के कुछ हफ़्तों बाद वायरल हुई असली फ़ोन रिकॉर्डिंग्स को समय के साथ होड़ लगाते इमरजेंसी कर्मचारियों के नाटकीय दृश्यों और उनके जज़्बात के साथ मिलाकर इस डॉक्युड्रामा में पेश किया है।

निर्देशक बेन हानिया लिखती हैं, “हिंसा से भरी तस्वीरें हमारी स्क्रीन्स, हमारी टाइमलाइन्स और हमारे फ़ोन्स पर हर जगह मौजूद हैं। मैं उस चीज़ को सामने लाना चाहती थी, जो आम तौर पर दूर बैठे हम लोग नहीं देख पाते। वह 'अदृश्य' पहलू : भयावह इन्तज़ार, डर, और मदद नहीं पहुँचने पर छा जाने वाला असहनीय सन्नाटा। कभी-कभी, जो चीज़ें हमें दिखाई नहीं देतीं, वे उन चीज़ों से कहीं ज़्यादा दिल दहला देने वाली होती हैं जो हमें दिखाई देती हैं। इस फ़िल्म का मूल-भाव बहुत ही सीधा-सादा है, लेकिन उसे सहन कर पाना बेहद मुश्किल है। मैं ऐसी दुनिया को स्वीकार नहीं कर सकती, जहाँ कोई बच्चा मदद के लिए पुकारे और कोई भी उसकी मदद न कर पाये। वह दर्द, वह नाकामी – हम सभी की साझा नाकामी है।”

सवा घंटे की यह बेहद इंटेंस फ़िल्म हर संवेदनशील इंसान को झकझोर कर रख देती है।

ट्यूनीशिया और फ़्रांस की यह साझा प्रस्तुति है और दुनिया के कई बड़े फ़िल्मकार और अभिनेता एग्ज़िक्यूटिव प्रोड्यूसर के रूप में इससे जुड़े हैं, जिनमें ब्रैड पिट, जोक्विन फ़ीनिक्स, रूनी मारा, जोनाथन ग्लेज़र और अल्फ़ोंसो कुएरॉन जैसे नाम शामिल हैं। वेनिस फ़िल्म फ़ेस्टिवल में इसने 'सिल्वर लायन ग्रैंड जूरी प्राइज़' जीता और 98वें एकेडमी अवॉर्ड्स के लिए इसे 'बेस्ट इंटरनेशनल फ़ीचर फ़िल्म' श्रेणी में नामांकित किया गया था।

कल हम इसे देखेंगे और इस पर चर्चा करेंगे। जगह है, अनुराग लाइब्रेरी, डी-68, निराला नगर, लखनऊ (आईटी कॉलेज चौराहे के बिल्कुल पास)।

आप ख़ुद आइए और अपने दोस्तों को भी लेकर आइए। इस आमंत्रण को अपने दायरों में शेयर ज़रूर करिए।

कृपया समय से 10 मिनट पहले आने की कोशिश करें ताकि हम समय पर फ़िल्म शुरू कर सकें।

स्क्रीनिंग और चर्चा:
रविवार, 29 मार्च, शाम 4 बजे
अनुराग लाइब्रेरी, D-68, निराला नगर, लखनऊ
फ़ोन: 9910462009, 9455920657
आप सब अपने दोस्तों के साथ आमंत्रित हैं।

28/03/2026

कल की फ़िल्म The Voice of Hind Rajab का ट्रेलर

29 मार्च, शाम 4 बजे, अनुराग लायब्रेरी, ढी-68, निराला नगर, लखनऊ, आईटी कॉलेज चौराहे के पास

आप सब अपने दोस्तों के साथ आमंत्रित हैं....

January 29, 2024: a 5-year-old girl, Hind Rajab, is trapped in a car under heavy fire in Gaza, the sole survivor. Her em...
27/03/2026

January 29, 2024: a 5-year-old girl, Hind Rajab, is trapped in a car under heavy fire in Gaza, the sole survivor. Her emergency calls reach the volunteers of the Palestine Red Crescent Society, who desperately attempt to calm and rescue her—the latter obstructed by IDF checkpoints and the unlikelihood of safe passage.

Academy Award-nominated filmmaker Kaouther Ben Hania (Four Daughters) blends the actual phone recordings, which went viral several weeks after this incident, with dramatizations of the emergency workers racing against time, and the situation’s emotional impact, to coordinate paramedics who could save her.

Director Ben Hania writes, “Violent images are everywhere on our screens, our timelines, our phones. What I wanted was to focus on the invisible: the waiting, the fear, the unbearable sound of silence when help doesn’t come. Sometimes, what you don’t see is more devastating than what you do. At the heart of this film is something very simple, and very hard to live with. I cannot accept a world where a child calls for help and no one comes. That pain, that failure, belongs to all of us.”

Winner of the Silver Lion Grand Jury Prize at the Venice Film Festival. Tunisia’s Official Submission to the 98th Academy Awards. Nominated for the Best International Feature Film.

Screening & Discussion:
Sunday, 29 March, 4 PM
Anurag Library, D-68, Nirala Nagar, Lucknow
Ph: 9910462009, 9455920657

All are invited.

‘लखनऊ सिनेफ़ाइल्स़’ में इस रविवार (29 मार्च) की फ़िल्म है – The Voice of Hind Rajab.इस वर्ष ऑस्कर पुरस्कारों में सर्वश्र...
24/03/2026

‘लखनऊ सिनेफ़ाइल्स़’ में इस रविवार (29 मार्च) की फ़िल्म है – The Voice of Hind Rajab.

इस वर्ष ऑस्कर पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ अंतरराष्ट्रीय फ़ीचर फ़िल्म के लिए नामांकित यह फ़िल्म एक डॉक्युड्रामा है।

29 जनवरी 2024 को रेड क्रिसेंट के वॉलंटियर्स के पास छह साल की एक डरी हुई बच्ची का फ़ोन आता है। वह ग़ज़ा में अपने चाचा के परिवार के साथ जा रही थी जब इज़रायली सेना ने उनकी कार पर अंधाधुंध गोलियाँ बरसाईं। फ़ोन पर वह बच्ची उसे बचाने के लिए पुकार रही थी। कार में वह अपने चाचा, चाची और तीन भाई-बहनों के शवों के नीचे दबी हुई थी।

उस बच्ची का नाम था हिंद रजब। रेड क्रिसेंट के वॉलंटियर उसे लाइन पर रखते हुए उसे बचाने और उसके पास एक एंबुलेंस पहुँचाने की हर मुमकिन कोशिश करते हैं।

सवा घंटे की यह बेहद इंटेंस फ़िल्म हर संवेदनशील इंसान को झकझोर कर रख देती है।

ट्यूनीशिया और फ़्रांस की यह साझा प्रस्तुति है और दुनिया के कई बड़े फ़िल्मकार और अभिनेता एग्ज़िक्यूटिव प्रोड्यूसर के रूप में इससे जुड़े हैं, जिनमें ब्रैड पिट, जोक्विन फ़ीनिक्स, रूनी मारा, जोनाथन ग्लेज़र और अल्फ़ोंसो कुएरॉन जैसे नाम शामिल हैं।

इस रविवार को हम इसे देखेंगे और इस पर चर्चा करेंगे। जगह है, अनुराग लाइब्रेरी, डी-68, निराला नगर, लखनऊ (आईटी कॉलेज चौराहे के बिल्कुल पास)।

आप ख़ुद आइए और अपने दोस्तों को भी लेकर आइए। इस आमंत्रण को अपने दायरों में शेयर ज़रूर करिए।

कृपया समय से 10 मिनट पहले आने की कोशिश करें ताकि हम समय पर फ़िल्म शुरू कर सकें।

दिल्ली और आसपास के दोस्तों के लिएतीन बेहतरीन साम्राज्यवाद-विरोधी फ़िल्में देखने और उन पर चर्चा का मौक़ा...
13/03/2026

दिल्ली और आसपास के दोस्तों के लिए
तीन बेहतरीन साम्राज्यवाद-विरोधी फ़िल्में देखने और उन पर चर्चा का मौक़ा...

दोस्तो, अन्तरराष्ट्रीय स्त्री दिवस के मौक़े पर लखनऊ सिनेफ़ाइल्स के टेलीग्राम चैनल पर आज हमने एक बेहतरीन फ़िल्म Suffraget...
09/03/2026

दोस्तो, अन्तरराष्ट्रीय स्त्री दिवस के मौक़े पर लखनऊ सिनेफ़ाइल्स के टेलीग्राम चैनल पर आज हमने एक बेहतरीन फ़िल्म Suffragette शेयर की है। फ़िल्म के हिन्दी और अंग्रेज़ी सबटाइटल्स भी साथ में हैं।

हमारे टेलीग्राम चैनल से जुड़ने का लिंक पोस्ट के अन्त में दिया है।

हमारा सुझाव है कि आप फ़िल्म और सबटाइटल्स कंप्यूटर या लैपटॉप पर डाउनलोड करके इसे देखें। फ़िल्म और सबटाइटल्स की फ़ाइलें एक फ़ोल्डर में डाउनलोड करने के बाद VLC Media Payer या ऐसे ही किसी अन्य प्रोग्राम के ज़रिए इसे देखा जा सकता है। VLC में आप इसके सबटाइटल्स का फ़ॉण्ट भी सुविधानुसार बड़ा कर सकते हैं और इसका रंग भी बदल सकते हैं या पढ़ने में आसानी के लिए सबटाइटल्स के पीछे बैकग्राउण्ड भी लगा सकते हैं। इसके लिए VLC के Tools मेनू में जाकर Preferences और फिर Subtitles/OSD पर क्लिक करें और सुविधानुसार चयन करें।

फ़िल्म के बारे में

सारा गैवरॉन द्वारा निर्देशित और अबी मॉर्गन द्वारा लिखित फिल्म 'सफ्रेजेट' केवल एक ऐतिहासिक ड्रामा नहीं है, बल्कि यह उन गुमनाम 'पैदल सैनिकों' की कहानी है जिन्होंने स्त्रियों के वोट देने के अधिकार के लिए अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया। जहाँ अक्सर ऐसी फ़िल्मों में ऊंचे घरानों की शिक्षित महिलाओं को केंद्र में रखा जाता है, वहीं यह फ़िल्म लंदन की गलियों और फ़ैक्टरियों में काम करने वाली कामकाजी वर्ग की महिलाओं के संघर्ष को बड़ी ही संवेदनशीलता से पेश करती है।

कहानी 1912 के लंदन में शुरू होती है, जहाँ मुख्य पात्र मॉड वॉट्स (कैरी मलिगन) एक औद्योगिक लॉन्ड्री में काम करती है। मॉड बचपन से ही वहीं काम कर रही है; उसकी माँ की भी उसी जगह काम करते हुए मृत्यु हो गई थी। मॉड का जीवन बेहद साधारण है—वह अपने पति सॉनी (बेन विशॉ) और 4-5 साल के बेटे जॉर्ज के साथ रहती है और घर तथा काम के बीच ही उसका संसार सीमित है।

लेकिन परिस्थितियाँ धीरे-धीरे मताधिकार आंदोलन के महत्व से परिचित कराती हैं। उसकी सहकर्मी वायलेट मिलर (ऐन-मैरी डफ़) उसे पहली बार स्त्री-अधिकारों पर एक बैठक में ले जाती है। वहीं उसकी मुलाकात एडिथ एलिन (हेलेना बॉनहैम-कार्टर) से होती है, जो एक फ़ार्मासिस्ट होने के साथ-साथ आंदोलन की सक्रिय कार्यकर्ता भी है। इन स्त्रियों के प्रभाव से मॉड समझने लगती है कि उसके जीवन के कठिन हालात केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं बल्कि सामाजिक अन्याय का परिणाम हैं।

सफ़्रेजेट आंदोलन की प्रमुख नेता एमिलिन पैंकहर्स्ट (मेरिल स्ट्रीप) ने 1903 में विमेंस सोशल ऐंड पोलिटिकल यूनियन (WSPU) की स्थापना की थी जिसका प्रसिद्ध नारा था — “बातें नहीं, काम”। दशकों तक स्त्रियों के शांतिपूर्ण आंदोलन के तिरस्कार और अनदेखी किये जाने के बाद मिसेज़ पैंकहर्स्ट की अगुवाई में स्त्रियों ने नागरिक अवज्ञा और जुझारू प्रतिरोध का रास्ता अपनाया था।

फ़िल्म का एक महत्वपूर्ण दृश्य तब आता है जब ब्रिटेन के वित्तमंत्री लॉयड जॉर्ज कामकाजी महिलाओं की गवाहियाँ सुनने के लिए समिति बनाते हैं। यूनियन की ओर से मॉड संसद में जाकर अपने अनुभव बताती है — कैसे सात साल की उम्र से वह खतरनाक परिस्थितियों में काम कर रही है और कैसे महिलाओं के लिए जीवन का कोई विकल्प नहीं है। स्त्रियों को उम्मीद बँधती है कि शायद सरकार उनकी बात सुनेगी, लेकिन जब प्रधानमंत्री उन्हें मतदान का अधिकार देने से इनकार कर देते हैं, तो आंदोलन और उग्र हो जाता है।

कई प्रदर्शन होते हैं, जिनमें मॉड और उसकी साथियों को गिरफ्तार किया जाता है। जेल में उन्हें कठोर यातनाएँ झेलनी पड़ती हैं। भूख-हड़ताल करने वाली महिलाओं को जबरन खाना खिलाया जाता है। पुलिस अधिकारी इंस्पेक्टर स्टीड (ब्रेंडन ग्लीसन) आंदोलन को दबाने के लिए निगरानी और दमन का सहारा लेता है। इस संघर्ष की कीमत मॉड को अपने निजी जीवन में भी चुकानी पड़ती है — वह अपनी नौकरी खो देती है और अंततः उसे अपने पति और बेटे से भी अलग होना पड़ता है।

फ़िल्म का सबसे मार्मिक हिस्सा उस ऐतिहासिक घटना से जुड़ा है जिसने पूरे आंदोलन को नई दिशा दी। 1913 में डर्बी रेस के दौरान आंदोलनकारी एमिली डेविसन अपना बैनर लेकर घुड़दौड़ के ट्रैक पर उतर जाती हैं और राजा के घोड़े के सामने आ जाती हैं। गंभीर रूप से घायल होकर उसकी मृत्यु हो जाती है। यह घटना पूरी दुनिया में ख़बर बनती है और स्त्रियों के मताधिकार के संघर्ष का एक निर्णायक मोड़ साबित होती है। एमिली के अंतिम संस्कार में हज़ारों महिलाएँ सड़क पर उतर आती हैं।

फ़िल्म की ख़ासियत यह है कि यह प्रसिद्ध नेताओं पर केंद्रित नहीं रहती, बल्कि आंदोलन के “पैदल सैनिकों”, यानी आम कामकाजी महिलाओं, की कहानी कहती है जो उसकी असली ताक़त थीं। स्त्री आंदोलन के भीतर मौजूद वर्गीय अंतर को भी फ़िल्म बारीक़ी से दिखाती है। उच्च वर्ग की महिलाओं (जैसे सांसद हॉटन की पत्नी एलिस) के गिरफ़्तार होने पर आसानी से ज़मानत हो जाती है, वहीं मॉड और वायलेट जैसी मेहनतकश औरतों को जेल काटनी पड़ती है और उनकी नौकरियाँ चली जाती हैं। सक्रियता की कीमत उन्हें परिवार में हिंसा, समाज से अलगाव और अक्सर अपने बच्चों तक से अलग होकर चुकानी पड़ती है। इस प्रश्न पर फ़िल्म विस्तार में तो नहीं जाती, पर यह संकेत देती है कि स्त्री-अधिकारों का प्रश्न केवल लैंगिक नहीं बल्कि वर्गीय सवाल भी है।

मॉड की भूमिका में कैरी मलिगन का अभिनय बहुत प्रभावशाली है। एक साधारण, डरी-सहमी कामकाजी लड़की से एक दृढ़ और साहसी आंदोलनकारी बनने की प्रक्रिया को वह बहुत स्वाभाविक ढंग से दिखाती हैं। अपने परिवार और बच्चे से अलग होने की पीड़ा के साथ ही आंदोलन में सक्रियता और साथीपन की ख़ुशी के भाव भी बहुत सहज ढंग से प्रकट होते हैं। एडिथ की भूमिका में हेलेना बोनहैम-कार्टर, वॉयलेट के तौर पर ऐन-मेरी डफ़ और मिसेज़ पैंकहर्स्ट की छोटी-सी भूमिका में मेरिल स्ट्रीप ने भी प्रभावी काम किया है। आंदोलन को कुचलने की ज़िम्मेदारी और स्त्रियों के प्रति सहानुभूति का द्वंद्व इंस्पेक्टर स्टीड की भूमिका में ब्रैंडन ग्लीसन ने बख़ूबी दर्शाया है।

लखनऊ सिनेफ़ाइल्स ने अबतक बहुत-सी विदेशी और भारतीय भाषाओं की फ़िल्मों के हिन्दी सबटाइटल्स तैयार किये हैं। हम चाहते हैं कि ज़्यादा से ज़्यादा लोग इन बेहतरीन फ़िल्मों को देख सकें। इस चैनल से अपने दोस्तों को जोड़कर और/या अपनी जगह पर इसकी स्क्रीनिंग आयोजित करके आप भी इस काम में हमारी मदद कर सकते हैं।

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अन्तरराष्ट्रीय स्त्री दिवस के मौक़े पर आज लखनऊ सिनेफ़ाइल्स और स्त्री मुक्ति लीग के साझा कार्यक्रम में SUFFRAGETTE फ़िल्म ...
08/03/2026

अन्तरराष्ट्रीय स्त्री दिवस के मौक़े पर आज लखनऊ सिनेफ़ाइल्स और स्त्री मुक्ति लीग के साझा कार्यक्रम में SUFFRAGETTE फ़िल्म का प्रदर्शन किया गया और उसके बाद फ़िल्म तथा स्त्री मुक्ति से जुड़े विभिन्न सवालों पर विस्तृत चर्चा हुई। फ़िल्म के बेहतरीन हिन्दी सबटाइटिल्स ‘लखनऊ सिनेफ़ाइल्स’ ने तैयार किए हैं।

यह फ़िल्म पिछली सदी की शुरुआत में इंग्लैंड में स्त्रियों के मताधिकार के लिए चले आन्दोलन में शामिल मेहनतकश स्त्रियों के एक जुझारू समूह की कहानी कहती है। यह लड़ाई सिर्फ़ चुनाव में वोट देने के अधिकार की लड़ाई नहीं थी, बल्कि बराबर का इंसान समझे जाने के हक़ की लड़ाई थी।

कार्यक्रम की शुरुआत स्त्री मुक्ति लीग की शिप्रा, शिवानी और अन्य साथियों द्वारा प्रस्तुत गीत ‘औरतें उट्ठी नहीं तो ज़ुल्म बढ़ता जाएगा’ से हुई।

फ़िल्म के बाद हुई बातचीत में इस बात को पुरज़ोर ढंग से रखा गया कि आज स्त्रियों को जो भी अधिकार मिले हैं, वे किसी की नेकनीयती से या ख़ैरात में नहीं मिले हैं बल्कि उनके पीछे जुझारू संघर्षों का एक लंबा इतिहास है। कवयित्री कात्यायनी ने स्त्री-अधिकारों के लिए संघर्ष और 8 मार्च की विरासत का विस्तार से परिचय दिया। आज बाज़ार इसे महज़ एक उत्सव की तरह पेश करता है जिसकी चकाचौंध में अधिकांश स्त्रियाँ भी इस दिन की असली विरासत को भूल गई हैं।

बातचीत में आज अपने देश में और दुनियाभर में स्त्रियों के अधिकारों पर बढ़े हमलों, पितृसत्ता की बढ़ती जकड़बंदी और स्त्रियों को पूँजी की नई ग़ुलामी में धकेल देने की, मीडिया और बाज़ार द्वारा प्रतिगामी मूल्यों को बढ़ावा देने की और “महिला सशक्तिकरण” के नाम पर कुछ झुनझुने और महज़ काग़ज़ी अधिकार देने के सत्ता के प्रयासों पर भी चर्चा हुई। अपने देश में स्त्री अधिकारों के लिए लड़ने वाली सावित्रीबाई फुले, फ़ातिमा शेख़ से लेकर तमाम आंदोलनों में जुझारू भूमिका निभाने वाली मेहनतकश स्त्रियों की बात भी हुई। इस पर भी बात हुई कि स्त्रियों की बराबरी की लड़ाई अकेले और अलग-थलग रहकर नहीं बल्कि पूरे समाज को बदलने के व्यापक संघर्ष का एक हिस्सा बनकर ही अपने अंजाम तक पहुँच सकती है।

अमिता सिंह व उनकी माँ, मानसी सक्सेना, शिप्रा, असग़र मेहदी, डॉ. उमेश सचान, नदीम साहिल, आकाश शर्मा, मो. उमैर, तनवीर आलम, धनंजय, पुनीत, लालचन्द्र, विकास, राजू आदि ने बातचीत में हिस्सा लिया। सत्यम ने शुरू में फ़िल्म और लखनऊ सिनेफ़ाइल्स का संक्षिप्त परिचय दिया। चर्चा में उठे कुछ सवालों पर आगे अलग से विस्तृत चर्चा रखे जाने पर भी सहमति बनी।

फ़िल्म के बारे में

सारा गैवरॉन द्वारा निर्देशित और अबी मॉर्गन द्वारा लिखित फिल्म 'सफ्रेजेट' केवल एक ऐतिहासिक ड्रामा नहीं है, बल्कि यह उन गुमनाम 'पैदल सैनिकों' की कहानी है जिन्होंने स्त्रियों के वोट देने के अधिकार के लिए अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया। जहाँ अक्सर ऐसी फ़िल्मों में ऊंचे घरानों की शिक्षित महिलाओं को केंद्र में रखा जाता है, वहीं यह फ़िल्म लंदन की गलियों और फ़ैक्टरियों में काम करने वाली कामकाजी वर्ग की महिलाओं के संघर्ष को बड़ी ही संवेदनशीलता से पेश करती है।

कहानी 1912 के लंदन में शुरू होती है, जहाँ मुख्य पात्र मॉड वॉट्स (कैरी मलिगन) एक औद्योगिक लॉन्ड्री में काम करती है। मॉड बचपन से ही वहीं काम कर रही है; उसकी माँ की भी उसी जगह काम करते हुए मृत्यु हो गई थी। मॉड का जीवन बेहद साधारण है—वह अपने पति सॉनी (बेन विशॉ) और 4-5 साल के बेटे जॉर्ज के साथ रहती है और घर तथा काम के बीच ही उसका संसार सीमित है।

लेकिन परिस्थितियाँ धीरे-धीरे मताधिकार आंदोलन के महत्व से परिचित कराती हैं। उसकी सहकर्मी वायलेट मिलर (ऐन-मैरी डफ़) उसे पहली बार स्त्री-अधिकारों पर एक बैठक में ले जाती है। वहीं उसकी मुलाकात एडिथ एलिन (हेलेना बॉनहैम-कार्टर) से होती है, जो एक फ़ार्मासिस्ट होने के साथ-साथ आंदोलन की सक्रिय कार्यकर्ता भी है। इन स्त्रियों के प्रभाव से मॉड समझने लगती है कि उसके जीवन के कठिन हालात केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं बल्कि सामाजिक अन्याय का परिणाम हैं।

सफ़्रेजेट आंदोलन की प्रमुख नेता एमिलिन पैंकहर्स्ट (मेरिल स्ट्रीप) ने 1903 में विमेंस सोशल ऐंड पोलिटिकल यूनियन (WSPU) की स्थापना की थी जिसका प्रसिद्ध नारा था — “बातें नहीं, काम”। दशकों तक स्त्रियों के शांतिपूर्ण आंदोलन के तिरस्कार और अनदेखी किये जाने के बाद मिसेज़ पैंकहर्स्ट की अगुवाई में स्त्रियों ने नागरिक अवज्ञा और जुझारू प्रतिरोध का रास्ता अपनाया था।

फ़िल्म का एक महत्वपूर्ण दृश्य तब आता है जब ब्रिटेन के वित्तमंत्री लॉयड जॉर्ज कामकाजी महिलाओं की गवाहियाँ सुनने के लिए समिति बनाते हैं। यूनियन की ओर से मॉड संसद में जाकर अपने अनुभव बताती है — कैसे सात साल की उम्र से वह खतरनाक परिस्थितियों में काम कर रही है और कैसे उस जैसी महिलाओं के लिए जीवन का कोई विकल्प नहीं है। स्त्रियों को उम्मीद बँधती है कि शायद सरकार उनकी बात सुनेगी, लेकिन जब प्रधानमंत्री उन्हें मतदान का अधिकार देने से इनकार कर देते हैं, तो आंदोलन और उग्र हो जाता है।

कई प्रदर्शन होते हैं, जिनमें मॉड और उसकी साथियों को गिरफ्तार किया जाता है। जेल में उन्हें कठोर यातनाएँ झेलनी पड़ती हैं। भूख-हड़ताल करने वाली महिलाओं को जबरन खिलाया जाता है। पुलिस अधिकारी इंस्पेक्टर स्टीड (ब्रेंडन ग्लीसन) आंदोलन को दबाने के लिए निगरानी और दमन का सहारा लेता है। इस संघर्ष की कीमत मॉड को अपने निजी जीवन में भी चुकानी पड़ती है — वह अपनी नौकरी खो देती है और अंततः उसे अपने पति और बेटे से भी अलग होना पड़ता है।

फ़िल्म का सबसे मार्मिक हिस्सा उस ऐतिहासिक घटना से जुड़ा है जिसने पूरे आंदोलन को नई दिशा दी। 1913 में डर्बी रेस के दौरान आंदोलनकारी एमिली डेविसन अपना बैनर लेकर घुड़दौड़ के ट्रैक पर उतर जाती हैं और राजा के घोड़े के सामने आ जाती हैं। गंभीर रूप से घायल होकर उसकी मृत्यु हो जाती है। यह घटना पूरी दुनिया में ख़बर बनती है और स्त्रियों के मताधिकार के संघर्ष का एक निर्णायक मोड़ साबित होती है। एमिली के अंतिम संस्कार में हज़ारों महिलाएँ सड़क पर उतर आती हैं।

फ़िल्म की ख़ासियत यह है कि यह प्रसिद्ध नेताओं पर केंद्रित नहीं रहती, बल्कि आंदोलन के “पैदल सैनिकों”, यानी आम कामकाजी महिलाओं, की कहानी कहती है जो उसकी असली ताक़त थीं। स्त्री आंदोलन के भीतर मौजूद वर्गीय अंतर को भी फ़िल्म बारीक़ी से दिखाती है। उच्च वर्ग की महिलाओं (जैसे सांसद हॉटन की पत्नी एलिस) के गिरफ़्तार होने पर आसानी से ज़मानत हो जाती है, वहीं मॉड और वायलेट जैसी मेहनतकश औरतों को जेल काटनी पड़ती है और उनकी नौकरियाँ चली जाती हैं। सक्रियता की कीमत उन्हें परिवार में हिंसा, समाज से अलगाव और अक्सर अपने बच्चों तक से अलग होकर चुकानी पड़ती है। इस प्रश्न पर फ़िल्म विस्तार में तो नहीं जाती, पर यह संकेत देती है कि स्त्री-अधिकारों का प्रश्न केवल लैंगिक नहीं बल्कि वर्गीय सवाल भी है।

मॉड की भूमिका में कैरी मलिगन का अभिनय बहुत प्रभावशाली है। एक साधारण, डरी-सहमी कामकाजी लड़की से एक दृढ़ और साहसी आंदोलनकारी बनने की प्रक्रिया को वह बहुत स्वाभाविक ढंग से दिखाती हैं। अपने परिवार और बच्चे से अलग होने की पीड़ा के साथ ही आंदोलन में सक्रियता और साथीपन की ख़ुशी के भाव भी बहुत सहज ढंग से प्रकट होते हैं। एडिथ की भूमिका में हेलेना बोनहैम-कार्टर, वॉयलेट के तौर पर ऐन-मेरी डफ़ और मिसेज़ पैंकहर्स्ट की छोटी-सी भूमिका में मेरिल स्ट्रीप ने भी प्रभावी काम किया है। आंदोलन को कुचलने की ज़िम्मेदारी और स्त्रियों के प्रति सहानुभूति का द्वंद्व इंस्पेक्टर स्टीड की भूमिका में ब्रैंडन ग्लीसन ने बख़ूबी दर्शाया है।

इस मौक़े पर ‘स्त्री मुक्ति लीग’ की ओर से पोस्टर प्रदर्शनी ‘मुक्ति के स्वर’ लगायी गयी थी और जनचेतना के सहयोग से स्त्री प्रश्न पर कुछ चुनिन्दा किताबें और पर्चे भी प्रदर्शित किये गये थे।

फ़िल्म स्क्रीनिंग के दौरान पता चलीं हिन्दी सबटाइटल्स की कुछ छोटी-मोटी ग़लतियों को ठीक करके हम इसे ‘लखनऊ सिनेफ़ाइल्स’ के टेलीग्राम चैनल पर कल शेयर कर देंगे।

07/03/2026

कल अंतरराष्ट्रीय स्त्री दिवस के मौक़े पर लखनऊ सिनेफ़ाइल्स में दिखाई जाने वाली फ़िल्म
SUFFRAGETTE का ट्रेलर

8 मार्च, रविवार, शाम 4 बजे से

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