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06/03/2021
03/03/2021

On the occasion of international women’s Day.
चित्रनगरी Cinephiles Mumbai presents
Film 🎥 Screening of 'Salt of the Earth' (with hindi subtitles) followed with discussion.

Date - 6th march 2021, Saturday Time-7 pm
Place- Mankhurd,Mumbai
Contact-8826265960,9619039793

Note:- चित्रनगरी Cinephiles Mumbai appreciates Lucknow Cinephiles for uploading the film with Hindi subtitles on YouTube.
For the link check the comment box.

10/02/2021

‘लखनऊ सिनेफ़ाइल्स’ की ओर से फ़िल्म शो और बातचीत की रविवारी श्रृंखला में इस बार हम ‘द यंग कार्ल मार्क्स’ फ़िल्म का प्रदर्शन कर रहे हैं।

प्रसिद्ध निर्देशक राउल पेक की पिछले वर्ष आयी यह फ़िल्म 19वीं सदी के पूर्वार्द्ध में दो महान मस्तिष्कों, कार्ल मार्क्स और फ़्रेडरिक एंगेल्स के मिलने, दुनिया को बदलने के विज्ञान की खोज में उनकी जद्दोजहद और उनकी कालजयी रचना ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ के लिखे जाने तक की यात्रा को दिलचस्प ढंग से बयान करती है। हम मार्क्स की जीवन संगिनी जेनी के साथ ही उस समय की ऐसी अनेक शख़्सियतों प्रूधों, बाकूनिन, वाइटलिंग, ब्रूनो बावेर, रूगे, द लीग ऑफ़ जस्ट आदि से भी मिलते हैं जिनके साथ उलझते-टकराते हुए मार्क्स और एंगेल्स अपनी विचार यात्रा में आगे बढ़ते हैं। अपनी कुछ कमज़ोरियों के बावजूद यह फ़िल्म मार्क्स के जीवन के एक बेहद अहम दौर की तस्वीर पेश करती है और उनके जीवन और विचारों को और गहराई से जानने-समझने की उत्सुकता जगाती है। ख़ासकर ऑगुस्त डाइल (मार्क्स), स्तेफ़ान कोनार्स्‍के (एंगेल्स) और विकी क्राइप्स (जेनी) का बेहतरीन अभिनय फ़िल्म को जीवन्त बनाये रखता है।

राउल पेक ‘आई ऐम नॉट योर नीग्रो’ और ‘लुमुम्बा’ जैसी फ़िल्मों के लिए जाने जाते हैं।

फ़ि‍ल्म मूल रूप से जर्मन में है जिसे हम हिन्दी सबटाइटल्स के साथ देखेंगे।

आप सब आमंत्रित हैं। कृपया समय से 10 मिनट पहले आने की कोशिश करें।

प्रवेश निःशुल्क।

31/01/2021
In Solidarity with Rahul Roy and Saba Dewan : Online Film Festival by several film collectivesIn solidarity with the fil...
22/10/2020

In Solidarity with Rahul Roy and Saba Dewan : Online Film Festival by several film collectives

In solidarity with the filmmakers, and in protest against the continued harassment, intimidation, incarceration of activists, artists and intellectuals by the regime.

Schedule of Online Film Screening by People's Film Collective (West Bengal):

1) 24 Oct (Saturday) ; from 10 am, for 48 hours, hosted on People's Film Collective YouTube channel and page.
Film : THE OTHER SONG (Dir: Saba Dewan)

2) 25 Oct (Sunday); from 10 am, for 48 hours, hosted on People's Film Collective YouTube channel and page.
Film : THE FACTORY (Dir: Rahul Roy)

Organised by People's Film Collective (West Bengal) in association with Marupakkam (Chennai), Pedestrian Pictures (Bangalore), Vikalp @ Prithvi (Mumbai), Cinema of Resistance (Ghaziabad).

30/07/2020

If stars are lit
It means there is someone who needs it,
It means someone wants them to be,
That someone deems those specks of spit
Magnificent!

- Vladimir Mayakovsky
(19 July 1893 - 14 April 1930)

Painting 'The Starry Night' by Vincent Van Gogh (30 March 1853 - 29 July 1890)

कोस्ता गावरास की ‘ज़ेड’ (हिन्दी सब-टाइटिल्स के साथ)दोस्तो, लखनऊ सिनेफ़ाइल्‍स की ओर से आप इस बेहद प्रासंगिक फ़िल्म को देखन...
22/05/2020

कोस्ता गावरास की ‘ज़ेड’ (हिन्दी सब-टाइटिल्स के साथ)

दोस्तो, लखनऊ सिनेफ़ाइल्‍स की ओर से आप इस बेहद प्रासंगिक फ़िल्म को देखने और इस पर चर्चा करने के लिए आमंत्रित हैं।

नीचे दिये लिंक पर जाकर आप हिन्दी सबटाइ‍टिल्स के साथ यह फ़ि‍ल्म देख सकते हैं। फ़ि‍ल्म का परिचय नीचे दिया है।

आप जानते ही हैं ‍कि पहले लखनऊ ‍सिनेफ़ाइल्स की टीम की व्यस्तताओं और फिर लॉकडाउन के कारण साथ बैठकर देश-दुनिया की बेहतरीन फ़िल्में देखने और उन पर चर्चा का हमारा नियमित कार्यक्रम लम्बे समय से बन्द है और शायद अभी काफ़ी अरसे तक हमें ऐसा मौक़ा नहीं मिल पायेगा। ऐसे में हम बीच-बीच में कुछ फ़ि‍ल्में ऑनलाइन देखने और उन पर चर्चा करने का आयोजन कर रहे हैं। ख़ास तौर पर ‍हिन्दी से इतर भाषाओं की वे फ़ि‍‍ल्में जिनकी हिन्दी सबटाइटिल्स लखनऊ सिनेफ़ाइल्स ने तैयार की हैं।

इस कड़ी में हम मई ‍दिवस के मौक़े पर दो फ़ि‍‍ल्मों 'सॉल्ट ऑफ़ द अर्थ' और 'द ऑर्गनाइज़र' के अलावा 'द यंग कार्ल मार्क्स' उपलब्‍ध करा चुके हैं।

आज की फ़िल्म के बारे में‍

‘ज़ेड’ विश्व सिनेमा की एक क्लासिक फ़िल्म है। यह उन फिल्मों में से एक है जिनमें दिखाई गई सच्चाई कई दशकों के फ़ासले के बावजूद बिल्कुल हमारे समय जैसी है। एक राजनीतिक थ्रिलर के रूप में बनी यह फ़िल्म ग्रीस में एक लोकप्रिय वाम नेता की एक दक्षिणपंथी संगठन द्वारा की गई हत्या, सैनिक तानाशाही द्वारा उस पर लीपापोती की कोशिशों और इंसाफ़ के लिए लड़ाई के बारे में है। फ़िल्म का नाम उस समय लोगों में बेहद लोकप्रिय हुए प्रतिरोध के नारे (ग्रीक शब्द Ζει) से लिया गया है जिसका अर्थ है ‘वह ज़िन्दा है’।

कहानी बिल्कुल सीधे-सादे ढंग से कही गई है और तथ्यों पर आधारित है। 22 मई 1963 को ग्रीस में विपक्षी पार्टी के नेता ग्रिगोरी लैंब्राकिस एक कथित ‘‘ट्रैफिक दुर्घटना’’ में घायल हुए जिनसे उनकी मृत्यु हो गई। हत्या को दुर्घटना साबित करने की सरकारी कोशिशों के खि़लाफ़ लोग सड़कों पर उतर आये, तो सरकार ने मामले की जाँच के लिए एक जज को नियुक्त किया। उसे स्पष्ट संकेत था कि मृत्यु के बारे में सरकारी बयान की ही पुष्टि करनी है, लेकिन जाँच के दौरान उसे यह विश्वास हो गया कि विपक्षी नेता की हत्या वास्तव में एक खुफिया दक्षिणपंथी संगठन ने की है। सेना और पुलिस के कई ऊँचे अधिकारियों पर मुकदमा चला। अदालत में पूरी साज़िश का पर्दाफ़ाश हुआ और सज़ाएँ दी गईं — हत्या को अंजाम देने वाले छोटे प्यादों को सख़्त सज़ाएँ मिलीं, मगर इसका आदेश देने वाले आला अफ़सर बरी हो गये। कहानी इतनी ही नहीं थी। 1967 के सैन्य तख्तापलट के बाद, सारे दक्षिणपंथी जनरलों और पुलिस चीफ़ को सभी आरोपों से मुक्त करके उनके पदों पर बहाल कर दिया गया। हत्या का पर्दाफ़ाश करने के लिए ज़िम्मेदार लोग अब राजनीतिक अपराधी बना दिये गये। जज सार्कत्ज़ेताकिस को टॉर्चर किया गया और पद से हटा दिया गया। मगर लैंब्राकिस के समर्थक अक्षर Z (ग्रीक शब्द Ζει यानी ‘वह ज़िन्दा है’) को प्रतिरोध के एक प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल करते रहे।

इन राजनीतिक घटनाओं को निर्देशक कोस्ता गावरास ने ऐसी शैली में फिल्म में उतारा है जो शुरू से अन्त तक दर्शकों को बाँधे रहती है। ‘ज़ेड’ एक ही साथ आक्रोश से भरी राजनीतिक आवाज़ भी है और एक शानदार सस्पेंस थ्रिलर भी।

दुनियाभर में दक्षिणपंथी सरकारों ने इस पर प्रतिबन्ध लगाया, और ग्रीस में यह 1974 में ही रिलीज़ हो पायी, सैनिक तानाशाही के पतन के बाद। कहने की ज़रूरत नहीं कि लोगों ने इसका शानदार स्वागत किया।

फ़ि‍ल्म देखने के‍ लिए नीचे दिये लिंक पर ‍क्लिक करें:
https://www.youtube.com/watch?v=pYaKi87l8YE

अगर आपको हिन्दी सबटाइटिल्स दिखाई नहीं दे रहे तो यूट्यूब पर वीडियो के दाएँ नीचे की ओर Subtitles/Close captions बटन पर ‍क्लिक करें, जैसाकि संलग्न तस्वीर में ‍दिखाया गया है।

फ़ि‍ल्म देखने के बाद अपनी राय ज़रूर दें।

16/05/2020

Shyam Benegal Interviewing Satyajit Ray "An Art Of Film" # # # # # Please do subscribe D Ente...

‘द ऑर्गनाइज़र’ (हिन्दी सबटाइटिल्स के साथ)दोस्तो, मई दिवस के मौक़े पर दूसरी फ़ि‍ल्म ‍प्रस्तुत है।नीचे दिये लिंक पर जाकर आ...
05/05/2020

‘द ऑर्गनाइज़र’ (हिन्दी सबटाइटिल्स के साथ)

दोस्तो, मई दिवस के मौक़े पर दूसरी फ़ि‍ल्म ‍प्रस्तुत है।

नीचे दिये लिंक पर जाकर आप हिन्दी सबटाइ‍टिल्स के साथ यह फ़ि‍ल्म देख सकते हैं। फ़ि‍ल्म का परिचय नीचे दिया है।

आप जानते ही हैं ‍कि पहले लखनऊ ‍सिनेफ़ाइल्स की टीम की व्यस्तताओं और फिर लॉकडाउन के कारण साथ बैठकर देश-दुनिया की बेहतरीन फ़िल्में देखने और उन पर चर्चा का हमारा नियमित कार्यक्रम लम्बे समय से बन्द है और शायद अभी काफ़ी अरसे तक हमें ऐसा मौक़ा नहीं मिल पायेगा। ऐसे में हम बीच-बीच में कुछ फ़ि‍ल्में ऑनलाइन देखने और उन पर चर्चा करने का आयोजन कर सकते हैं। ख़ास तौर पर ‍हिन्दी से इतर भाषाओं की वे फ़ि‍‍ल्में जिनकी हिन्दी सबटाइटिल्स लखनऊ सिनेफ़ाइल्स ने तैयार की हैं।

इस कड़ी की शुरुआत हमने मई ‍दिवस के मौक़े पर दो फ़ि‍‍ल्मों से की है। हमें उम्मीद है कि ये दोनों फ़ि‍ल्में आपको पसन्द आयेंगी और सोचने और बात करने के ‍लिए काफ़ी सामग्री भी देंगी।

आज की फ़ि‍ल्म के बारे में

प्रसिद्ध निर्देशक मारियो मोनिसेली द्वारा निर्देशित और अंग्रेज़ी में ‘दि ऑर्गेनाइज़र’ नाम से चर्चित इतालवी फ़िल्म ‘I Compagni’ (‘कॉमरेड्स’) मज़दूरों के जीवन और संघर्ष पर बनी एक क्लासिक नव-यथार्थवादी फ़िल्म है। फ़िल्म की पृष्ठभूमि में 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध का तूरिन शहर है। अपने दिलचस्प और मानवीय चरित्रों और उनके बीच की अन्तर्क्रियाओं के कारण दो घंटे की यह फ़िल्म दर्शकों को लगातार बाँधे रहती है।‍ प्रख्यात इतालवी फ़ि‍‍ल्‍म स्टार मार्सेलो मास्त्रेयानी का अभिनय तो ख़ास है ही, आम मज़दूरों के चरित्रों को जीवन्त कर देने वाले अभिनेताओं और अभिनेत्रियों ने भी कमाल किया है।

तूरिन की एक कपड़ा मिल के मज़दूरों की भयावह स्थितियों का फ़िल्म में बहुत ही मार्मिक और यथार्थवादी चित्रण किया गया है। कारख़ाने के मज़दूर इस बात से आक्रोशित हैं कि उन्हें दिन में 14 घंटे काम करना पड़ता है और खाना खाने के लिए केवल आधे घंटे का समय मिलता है। इतने लंबे समय तक बिना रुके काम करने से होने वाली थकावट के कारण मज़दूरों के साथ आये दिन दुर्घटनाएँ होती रहती हैं और घायल मज़दूरों की मदद की भी कोई व्यवस्था नहीं है। आक्रोशित होने के बावजूद मज़दूर केवल अपने घायल साथी के लिए आर्थिक सहयोग जुटाने तक सीमित रहते हैं। इन स्थितियों के विरुद्ध आवाज़ उठाने के बारे में वे नहीं सोचते। मगर ऐसी ही एक दुर्घटना से मज़दूरों का आक्रोश चरम पर पहुँच जाता है और उनके प्रतिनिधि काम के घंटे कम करने की माँग उठाने के लिए एक घंटा पहले काम बंद करने की योजना बनाते हैं। स्पष्ट योजना के अभाव और अनुभवहीनता के कारण उनका यह प्रयास विफ़ल हो जाता है।

मज़दूर फिर से बिना कोई ठोस योजना बनाए, काम बन्द करने के बारे में सोचते हैं। इसी बीच, प्रोफ़ेसर सिनिगैग्लिया (मार्सेलो मास्त्रोयानी) नाम का मज़दूर संगठनकर्ता उनके बीच आता है और उन्हें माँग माने जाने तक हड़ताल करने की सलाह देता है। कपड़ा मज़दूर उसके अनुभव से बेहतर ढंग से संगठित होना सीखते हैं। मज़दूर हड़ताल पर चले जाते हैं। इस बीच, मैनेजमेंट हड़ताल तोड़ने के लिए कई हथकण्डे अपनाता है। मैनेजमेंट की चालों के प्रतिरोध के दौरान पाउतासो नामक मज़दूर मारा जाता है। इधर, पुलिस भूमिगत हुए सिनिगैग्लिया का पता लगाने में सफ़ल हो जाती है। पुलिस से बचते-बचाते उसे फिर से किसी सुरक्षित जगह की ओर रवाना होना पड़ता है। हड़ताल को एक महीना होने वाला है और कारख़ाना मालिक भारी आर्थिक नुकसान से परेशान हैं और समझौता करने की तैयारी कर रहे हैं।

दूसरी ओर, मज़दूर नासमझी और अनुभवहीनता तथा कठिन परिस्थितियों के कारण निराश होने लगते हैं और हड़ताल समाप्त करने के बारे में सोचते हैं। इतने में सिनिगैग्लिया आ जाता है और मज़दूरों को कारख़ाने पर कब्ज़ा करके आन्दोलन को तेज़ करने को कहता है। कारख़ाना मालिक और प्रशासन अपना असली रूप दिखाता है और हड़ताली मज़दूरों को कारख़ाने में दाख़िल होने से रोकने के लिए सेना की टुकड़ी लगा दी जाती है। सैनिक हड़ताली मज़दूरों पर गोली चला देते हैं, जिसमें ओमेरो नामक तरुण मज़दूर की मौत हो जाती है। सिनिगैग्लिया को गिरफ़्तार कर लिया जाता है। हड़ताल कुचल दी जाती है। मज़दूर फिर से काम पर जाना शुरू कर देते हैं। इधर, युवा राउल संघर्ष को आगे बढ़ाने का दृढ़ संकल्प लेकर भूमिगत मज़दूर आन्दोलन में शामिल होने के लिए दूसरे शहर की ओर रवाना हो जाता है।

फ़ि‍ल्म देखने के‍ लिए नीचे दिये लिंक पर ‍क्लिक करें:
https://www.youtube.com/watch?v=gbbISHuyFso

अगर आपको हिन्दी सबटाइटिल्स दिखाई नहीं दे रहे तो यूट्यूब पर वीडियो के दाएँ नीचे की ओर Settings बटन पर ‍क्लिक करके Subtitles (CC) और फिर Hindi चुनें, जैसाकि संलग्न तस्वीर में ‍दिखाया गया है।

फ़ि‍ल्म देखने के बाद अपनी राय ज़रूर दें।

‘द यंग कार्ल मार्क्स’ (हिन्दी सबटाइटिल्स के साथ)वैज्ञानिक समाजवाद और सर्वहारा क्रान्ति के विज्ञान के जनक कार्ल मार्क्स क...
05/05/2020

‘द यंग कार्ल मार्क्स’ (हिन्दी सबटाइटिल्स के साथ)

वैज्ञानिक समाजवाद और सर्वहारा क्रान्ति के विज्ञान के जनक कार्ल मार्क्स के जन्मदिवस (5 मई) के अवसर पर कल शाम बहुचर्चित फ़िल्म 'द यंग कार्ल मार्क्स' ऑनलाइन देखने के ‍लिए 'लखनऊ सिनेफ़ाइल्स' की ओर से हम आपको आमंत्रित करते हैं। फ़ि‍ल्म मूल रूप से जर्मन में है जिसे आप हिन्दी सबटाइटल्स के साथ देख सकेंगे।

साथ बैठकर देश-दुनिया की बेहतरीन फ़िल्में देखने और उन पर चर्चा का हमारा नियमित कार्यक्रम लम्बे समय से बन्द है और शायद अभी काफ़ी अरसे तक हमें ऐसा मौक़ा नहीं मिल पायेगा। ऐसे में हमने बीच-बीच में कुछ फ़ि‍ल्में ऑनलाइन देखने और उन पर चर्चा करने की शुरुआत की है। इस श्रृंंखला में हम ख़ास तौर पर ‍हिन्दी से इतर भाषाओं की वे फ़ि‍‍ल्में प्रस्तुत करेंगे जिनकी हिन्दी सबटाइटिल्स लखनऊ सिनेफ़ाइल्स ने तैयार की हैं।

इस कड़ी की शुरुआत हमने मई ‍दिवस के मौक़े पर दो फ़ि‍‍ल्मों से की है। आप 2 और 4 मई की पोस्ट में उनका परिचय और फ़ि‍ल्मों का लिंक देख सकते हैं।

‘द यंग कार्ल मार्क्स’ के बारे में

तीन वर्ष पहले आयी प्रसिद्ध निर्देशक राउल पेक की यह फ़िल्म 19वीं सदी के पूर्वार्द्ध में दो महान मस्तिष्कों, कार्ल मार्क्स और फ़्रेडरिक एंगेल्स के मिलने, दुनिया को बदलने के विज्ञान की खोज में उनकी जद्दोजहद और उनकी कालजयी रचना 'कम्युनिस्ट घोषणापत्र' के लिखे जाने तक की यात्रा को दिलचस्प ढंग से बयान करती है। हम मार्क्स की जीवन संगिनी जेनी के साथ ही उस समय की ऐसी अनेक शख्सियतों प्रूधों, बाकूनिन, वाइटलिंग, ब्रूनो बावेर, रूगे, द लीग ऑफ़ जस्ट आदि से भी मिलते हैं जिनके साथ उलझते-टकराते हुए मार्क्स और एंगेल्स अपनी विचार यात्रा में आगे बढ़ते हैं। अपनी कुछ कमज़ोरियों के बावजूद यह फ़िल्म मार्क्स के जीवन के एक बेहद अहम दौर की तस्वीर पेश करती है और उनके जीवन और विचारों को और गहराई से जानने-समझने की उत्सुकता जगाती है। ऑगुस्त डाइल (मार्क्स), स्तेफ़ान कोनार्स्के (एंगेल्स) और विकी क्राइप्स (जेनी) का बेहतरीन अभिनय फ़िल्म को जीवन्त बनाये रखता है।

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