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26/05/2026
23/05/2026

मद्रास हाई कोर्ट ने सूर्या और तृषा की फिल्म 'करुप्पु' पर बैन लगाने की मांग को साफ इनकार कर दिया है। फिल्म को बैन करने के लिए अदालत में याचिका दी गई थी, जिसे कोर्ट ने ठुकरा दिया है और इसका कारण भी बताया है।

मद्रास उच्च न्यायालय ने गुरुवार को सूर्या और तृषा की फिल्म 'करुप्पु' पर बैन लगाने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया। यह फिल्म हाल ही में रिलीज हुई थी और इसमें न्यायपालिका को कथित तौर पर गलत तरीके से दिखाया गया था। याचिका को खारिज करते हुए, न्यायमूर्ति जी आर स्वामीनाथन और वी लक्ष्मीनारायणन की पीठ ने कहा कि वे फिल्म में हस्तक्षेप नहीं करना चाहते क्योंकि इसके मेकर्स को अभिव्यक्ति का अधिकार है।

अत्यंत ही सवेदनशील बिषय है आवेश और उत्तेजना मे आए बिना,सोच विचार की आवश्यकता है
23/05/2026

अत्यंत ही सवेदनशील बिषय है
आवेश और उत्तेजना मे आए बिना,
सोच विचार की आवश्यकता है

* झारखंड में बाहरी भाषा का अतिक्रमण- 3
* आज हम बात करेंगे ओड़िया भाषा का---
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सिंहभूम में ओड़िया भाषा कैसे आया इसको जानना बहुत ही दिलचस्प और जरूरी है। सिंहभूम में पोड़ाहाट राज(राजधानी चक्रधरपुर) और सरायकेला, खरसावां राजाओं का राज चलता था। कोल्हान में मानकी- मुंडा द्वारा शासन संचालित होता था और वह व्यवस्था आज भी जारी है। सरायकेला - खरसावां पहले एक Ruling chief के अधीन था । सरायकेला का पुराना नाम सालीगुटु था। 1857 में स्वतंत्रता संग्राम ( जिसे सिपाही विद्रोह कहा जाता है) के समय पोड़ाहाट के राजा अर्जुन सिंह अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह में शामिल हो गए। फलस्वरुप सरायकेला और खरसावां के राजा अंग्रेजों की तरफ हो गए। राजा अर्जुन सिंह को अंग्रेजों के हाथों पकड़वाने के लिए सरायकेला और खरसवां के राजा ने अपने गुप्तचरों को पूरे पोड़ाहाट राज के अंदर जगह-जगह भेज दिये। इस कार्य में अर्जुन सिंह के ससुर (मयूरभंज के राजा) भी अंग्रेजों का आदेश पालन कर रहे थे। अर्थात मयूरभंज राजा अपने दामाद को पकड़वाने के लिए अंग्रेजों का साथ दे रहे थे। अंततः 15 फरवरी 1859 को राजा अर्जुन सिंह को चक्रधरपुर से 7 किलोमीटर की दूरी पर कड़ाईकेला गांव में गिरफ्तार कर बनारस जेल भेज दिये गये, जहां अंग्रेजों ने उन्हें राजबंदी बना लिया। अर्जुन सिंह की राजबंदी उम्र कैद में बदल गई और 32 साल सजा काटते हुए बनारस में ही मृत्यु हो गई। इसके फलस्वरुप अंग्रेज शासकों ने सिंहभूम और पोड़ाहाट राज्य की कई हिस्सों को सरायकेला और खरसवां के राजाओं को पुरस्कार स्वरूप दे दिया। साथ ही साथ सरायकेला राजा को कई प्रमुख अधिकार सहित स्थाई लगान बंदोबस्त का अधिकार भी दिया गया। कहा जाता है कि फांसी का भी अधिकार मिला था।
ओड़िया भाषा कैसे थोपा गया ?
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सरायकेला- खरसावां, सिंहभूम जिले के मध्य है। यह ब्रिटिश काल में ऐतिहासिक, भाषिक, भौगोलिक, मौलिक और शासकीय तौर पर छोटानागपुर राज्य (रांची) का हिस्सा होता था, जहां सरकार का कामकाज हिंदी और अंग्रेजी से ही चलता था। स्कूलों में, सरकारी ऑफिस में क्रमशः हिंदी ही पढ़ा लिखा करते थे। 1915 -16 में सरायकेला- खरसावां को छोटानागपुर राज्य (रांची) से अलग कर वायसराय (बड़ालाट) संबलपुर एजेंट के अधीन कर दिया गया। उसके तुरंत बाद ही संबलपुर एजेंट वायसराय के आदेश से सरायकेला -खरसवां राजा की कचहरी में ओड़िया भाषा- भाषी के अफसर, कर्मचारी भर दिए गए। स्कूलों में ओड़िया भाषा लागू की गई। ओड़िया शिक्षकों की नियुक्ति की गई। राजा का आदेश हुआ कि राज्य में हर एक प्रजा को ओड़िया बोलना है, पढ़ना है, लिखना है।
ऐसा ही आदेश सिंहभूम के सीमावर्ती क्षेत्र ओडिशा स्थित क्योंझर, सुंदरगढ़, ,बोनाई, बांमड़ा, गंगपुर के राजाओं ने भी ओडिया भाषा जारी किया(ये देशी राज्य आजादी के पूर्व छोटानागपुर राज्य (रांची)के अधीन थे जहां हिंदी का प्रचलन था। ऐसा ही छोटानागपुर राज्य के कुछ हिस्से जैसे- सरगुजा, जशपुर, कोरिया, चंगभाकर, उदयपुर को तत्कालीन मध्यप्रदेश राज्य में शामिल किया गया जो अब छत्तीसगढ़ का हिस्सा है। ज्ञातव्य है कि छोटानागपुर एक बड़ा राज्य था जिसके हिस्से से काट-काटकर ओडिशा और मध्य प्रदेश (अब छत्तीसगढ़) में शामिल किया गया और बाकी हिस्सा "छोटानागपुर" झारखंड में है। जंगल- महाल पश्चिम बंगाल में है।
मयूरभंज एक स्वतंत्र देशी राज था , जहां प्रशासनिक और अदालती कामों में बांग्ला का चलन था । मयूर भंज के राजा और प्रजा ओडिशा में मिलना नहीं चाहते थे लेकिन तत्कालीन ओडिशा सरकार ने 6 फरवरी 1949 को गुंडुंरिया में गोली चालन कर लोगों की आवाज बंद कर दी और मयूरभंज, ओडिशा राज्य का हिस्सा बन गया। आज भी मयूरभंज जिले के ग्रामीण क्षेत्र में लोग बांग्ला भाषा का व्यवहार करते हैं लेकिन उन्हें ओड़िया भाषा पढ़ना-लिखना पड़ता है। कुल मिलाकर सिंहभूम में ओड़िया भाषा अभी-अभी 100 साल पूरी की है। अतः ओड़िया भाषा झारखंड की मूल भाषा नहीं है बल्कि एक अतिक्रमित भाषा है।
जारी है....
अगली कड़ी में बांग्ला भाषा की बात करेंगे,

शैलेंद्र महतो (पूर्व सांसद)
झारखंड आंदोलन के अग्रणी नेता

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